कोरोना महामारी की मार के बाद चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार जारी है। इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चीन की आर्थिक विकास दर 4.9 फीसदी रही। हालांकि यह विश्लेषकों के अनुमान से कम है, लेकिन जब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं सिकुड़ रही हैं, तब चीन की अर्थव्यवस्था में वृद्धि गौरतलब है। विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था कि दूसरी तिमाही में चीन की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 5.2 फीसदी रहेगी।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने हाल में विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में जो अनुमान जारी किया था, उसके मुताबिक इस वित्त वर्ष में जी-20 देशों के बीच सिर्फ चीन की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। बाकी तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाओं के सिकुड़ने का अनुमान है। भारत की अर्थव्यवस्था में तो 10.5 फीसदी के सिकुड़न का अंदाजा लगाया गया है। दुनिया की सबसे अर्थव्यवस्था अमेरिका भी मंदी का शिकार है।
इसके मद्देनजर वेबसाइट द यूरेशियन टाइम्स ने गणना की है परचेजिंग पॉवर पैरिटी (क्रय शक्ति समतुल्यता) के आधार पर चीन अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। आईएमएफ की मुताबिक इस साल अमेरिकी अर्थव्यवस्था 20.8 खरब डॉलर की रहेगी। जबकि पिछले वित्त वर्ष में अमेरिकी अर्थव्यवस्था 21.4 खरब डॉलर की थी। फिलहाल, चीनी अर्थव्यवस्था 14 खरब डॉलर से कुछ ज्यादा है, लेकिन क्रय शक्ति समतुल्यता के आधार गणना करने पर यह 24 खरब डॉलर से ज्यादा की बैठती थी।
सकल अर्थव्यवस्था का अनुमान दो देशों की मुद्रा विनिमय दर से लगाया जाता है। मसलन, चीन की अर्थव्यवस्था 14 खरब डॉलर एक डॉलर की कीमत 6.9 युवान (चीनी मुद्रा) की विनिमय दर के आधार पर बैठती है। जबकि क्रय शक्ति समतुल्यता का अर्थ यह होता है कि किसी देश में समान मुद्रा से कितनी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। अमेरिका में एक डॉलर से जितनी वस्तु खरीदी जा सकती है, चीन में आम तौर पर 5.71 युवान पर उतनी वस्तुएं मिल जाती हैं।
चीनी अर्थव्यवस्था की बढ़ती इसी ताकत का परिणाम है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में सिडनी स्थित लॉवी इंस्टीट्यूट कहा है कि इस इलाके में सबसे शक्तिशाली देश के रूप में चीन तेजी से अमेरिका की बराबरी करता दिख रहा है। इस इंस्टीट्यूट ने रविवार को एशिया पॉवर इंडेक्स-2020 जारी किया। इसमें अमेरिका अब भी पहले नंबर पर है, लेकिन दो साल पहले दूसरे नंबर पर आए चीन से उसका फासला 10 अंकों का था, जो अब महज पांच अंक रह गया है।
इंस्टीट्यूट ने कहा कि कोरोना महामारी को संभालने में अमेरिका ने जो गड़बड़झाला किया, उससे उसकी प्रतिष्ठा तेजी से गिरी है। इसके अलावा राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कई तरह के व्यापार विवादों में भी अपने देश को उलझा दिया है, जिससे विभिन्न देश अब अमेरिका को विश्वसनीय भागीदार नहीं मान रहे हैं।
इंस्टीट्यूट के मुताबिक कोरोना महामारी गेम चेंजर साबित हुई है। एक तरफ अमेरिका ने इस दौरान अपनी इज्जत गंवाई, वहीं चीन ने कोरोना महामारी को प्रभावी ढंग से संभाला और उसके बाद वह अपनी अर्थव्यवस्था को भी विकास के रास्ते पर लाने में सफल रहा है।
लॉवी इंस्टीट्यूट के इंडेक्स में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत को चौथा सबसे प्रभावशाली देश माना गया है। तीसरे नंबर जापान है। मगर भारत के बारे में इंस्टीट्यूट ने कहा है कि कोरोना महामारी के कारण उसने अपने विकास की संभावना एक हद तक गवां दी है।
अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक अब भारत चीन के सकल घरेलू उत्पादन के 40 फीसदी तक ही पहुंच पाएगा, जबकि पहले अनुमान 50 फीसदी तक पहुंच जाने का था। जाहिर है, जैसाकि लॉवी इंस्टीट्यूट ने कहा है, “(एशिया- प्रशांत) क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में भारत के आगमन में अब देर होने जा रही है।”