चीनी अधिकारियों ने बीते साल दिसंबर में एक गुप्त बैठक के दौरान चुपचाप स्वीकार किया कि अमेरिका के बुनियादी ढांचों पर साइबर हमलों के पीछे उनका हाथ था। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, जिनेवा में हुई यह बैठक अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव को और गहरा करती है। यह बैठक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन के कुछ प्रतिनिधियों की मौजूदगी में में हुई थी। इस दौरान चीनी प्रतिनिधियों ने संकेत दिया कि अमेरिकी बंदरगाहों, जल प्रणालियों, हवाई अड्डों और अन्य जरूरी ढांचे पर ये साइबर हमले अमेरिका के ताइवान को समर्थन देने के जवाब में किए गए थे।
इस तरह साइबर हमलों की बात स्वीकारना चीन की आम रणनीति से अलग था, क्योंकि वह पहले ऐसे हमलों से इनकार करता आ रहा था या उन्हें अपराधियों की करतूत बताकर टाल देता था। द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, चीन के इस साइबर अभियान ने बीते साल ही अमेरिकी अधिकारियों की नीदें उड़ा दी थी। इस साइबर अभियान को अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञों ने वोल्ट टाइफून नाम दिया है।
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अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के अनुसार, यह चीनी सेना से जुड़ा था और इसका मकसद अमेरिकी सिस्टम में चुपचाप घुसपैठ कर भविष्य में तेज और विनाशकारी हमलों के लिए खुद को तैयार रखना था। भले ही बैठक में चीन के तरफ से साइबर हमलों को लेकर दिए बयान अस्पष्ट थे, लेकिन अमेरिकी प्रतिनिधियों ने इसे जिम्मेदारी का संकेत और ताइवान से जुड़ी चेतावनी के तौर पर देखा। दिसंबर की इस बैठक के बाद अमेरिका-चीन संबंध और बिगड़ गए हैं।
चीन सॉल्ट टाइफून से यूएस टेलीकॉम प्रणालियों में लगा रहा सेंध
इस दौरान चीन और अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वॉर ने हालात और बदतर कर दिए हैं। जवाब में, ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने चीन के खिलाफ अधिक आक्रामक साइबर कार्रवाइयों का एलान किया है। उधर, अमेरिकी सांसदों और अधिकारियों ने बताया कि चीन सॉल्ट टाइफून नामक एक अलग साइबर अभियान के जरिए अब भी अमेरिका की टेलीकॉम प्रणालियों में सेंध लगा रहा है।
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साइबर सुरक्षा के हालिया बदलाव ट्रंप प्रशासन के लिए खतरा
वहीं, अमेरिका में साइबर सुरक्षा को लेकर हालिया बदलावों ने चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी सरकार ने सैकड़ों साइबर सुरक्षा पदों को खत्म करना शुरू कर दिया है। साथ ही, यूएस के राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के निदेशक जनरल टिमोथी हॉग और उनके डिप्टी वेंडी नोबल की हालिया बर्खास्तगी ने खुफिया विशेषज्ञों और सांसदों को फिक्र में डाल दिया है कि इससे अमेरिका की साइबर सुरक्षा कमजोर हो रही है। अब अधिकारी मानते हैं कि चीन के नागरिक ढांचे को बार-बार निशाना बनाना ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।