इन दिनों इंटरनेट की दुनिया में चैट जेनेरेटिव प्री-ट्रेंड ट्रांसफॉर्मर यानी चैटजीपीटी को लेकर खूब चर्चाएं हो रही हैं। ओपन-एआई कंपनी द्वारा तैयार किए गए इस चैटबॉट से आप जो भी सवाल करते हैं। उसका यह लगभग सटीक उत्तर देता है। हालांकि, अकादमिक और शिक्षा जगत के विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई है। कनाडा के ब्रोक विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर ब्लायन हगार्ट के अनुसार, 'हमें केवल इतनी चिंता नहीं कि चैटजीपीटी का उपयोग कर रहे धोखेबाजों को कैसे पकड़ेंगे? बल्कि सबसे बड़ी चिंता है कि कोई चैटजीपीटी से ली जानकारियों को सच कैसे मान सकता है?'
सच बनाम ‘केवल आउटपुट’
प्रो. ब्लायन के अनुसार, चैटजीपीटी इंसानों की नकल कर वाक्य व गद्यांश रचता है। यह वैज्ञानिक ढंग से लिखा गया लेख नहीं, केवल आउटपुट है, जिस पर अकादमिक क्षेत्र से जुड़े लेखकों के लेख या प्रेस रिपोर्टरों की सूचनाओं जैसा विश्वास नहीं किया जा सकता। लेख किस प्रकार तैयार हुए, यह बुनियादी फर्क है। चैटजीपीटी मशीन लर्निंग आधारित जटिल भाषायी मॉडल जैसा है, जो गूगल के 'ऑटो-कंप्लीट' फीचर की तरह काम करता है। चैटजीपीटी अपने लेख खुद भी नहीं समझता, यह केवल आउटपुट है, सच नहीं।