क्या है चाबहार बंदरगाह?
ओमान की खाड़ी में स्थित चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिणी-पूर्वी समुद्री किनारे पर बना है। यह 7,200 किलोमीटर लंबी बहु-मॉडल संपर्क परियोजना है, जो ईरान, रूस और मध्य एशिया के माध्यम से भारत को यूरोप से जोड़ता है। यह बंदरगाह भारत के पश्चिमी समुद्री तट से ईरान के दक्षिणी समुद्र तट को जोड़ता है। यह बंदरगाह कांडला से 885 किलोमीटर और मुंबई से लगभग 1,265 किलोमीटर दूर है। भारत चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ व्यापार करने के लिए करने वाला है।
चाबहार के विकास के लिए काम कर रहा भारत
भारत चाबहार बंदरगाह के एक हिस्से का विकास कर रहा है। इस बंदरगाह के विकास पर चर्चा 2003 में ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी की भारत यात्रा के दौरान हुई थी। 2013 में भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश करने की बात कही। इसके साथ चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए एक मई 2015 को एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान 23 मई, 2016 को ईरान की राजधानी तेहरान में 50 करोड़ डॉलर के निवेश की घोषणा की गई। हालांकि ईरान के संदिग्ध परमाणु कार्यक्रम के कारण उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते बंदरगाह के विकास की गति धीमी हो गई।
भारत ने 10 साल के लीज पर लिया था यह बंदरगाह
भारत ने 13 मई, 2024 को चाबहार बंदरगाह के एक हिस्से के संचालन के लिए 10 साल की लीज पर हस्ताक्षर किए। इससे उसे मध्य एशिया के साथ व्यापार बढ़ाने में मदद मिलेगी। यह पहली बार था, जब भारत ने किसी विदेशी बंदरगाह के प्रबंधन की जिम्मीदारी ली। इस समझौते पर इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) और ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन ने हस्ताक्षर किए। विदेश मंत्रालय की ओर से 2024-25 के लिए चाबहार बंदरगाह के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित किए थे।
भारत ने अब तक कितने का निवेश किया?
भारत ने चाबहार बंदरगाह के लिए वित्त वर्ष 2016-17 से वित्त वर्ष 2023-24 तक कुल 400 करोड़ रुपये आवंटित किए। इस बंदरगाह के विकास के लिए अब तक 201.51 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
अमेरिका ने अचानक ये प्रतिबंध क्यों लगा दिया?
अमेरिका ने 2018 में ईरान से परमाणु संधि खत्म करके कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए थे। हालांकि भारत को चाबहार बदंरगाह विकसित करने की विशेष छूट दी गई थी। अब ट्रंप प्रशासन ने चाबहार बंदरगाह से जुड़ी इसी छूट को खत्म करने की घोषणा की है। इस ईरानी बंदरगाह से काम करने वाली कंपनियों पर 29 सितंबर से प्रतिबंध लागू होगा। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रमुख उप-प्रवक्ता थॉमस पिगोट ने सप्ताह की शुरुआत में एक बयान दिया। इसमें उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान पुनर्निर्माण सहायता और आर्थिक विकास के लिए ईरान स्वतंत्रता और काउंटर-प्रोलिफरेशन एक्ट (आईएफसीए) के तहत 2018 में जारी प्रतिबंध छूट को रद्द किया जा रहा है।
अमेरिका ने ये कदम क्यों उठाया?
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार चाबहार बंदरगाह से रियायतों को खत्म करने बारे में अमेरिका का तर्क है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अधिकतम दबाव नीति की अनुसार और ईरान सरकार को अलग-थलग करने के लिए यह कदम उठाया गया है। इसके साथ ही अमेरिका ने अपने बयान में कहा है कि ईरान, हांगकांग और संयुक्त अरब अमीरात में स्थित अवैध वित्तीय नेटवर्क के जरिए अस्थिरता फैला रहा है। इन नेटवर्कों ने ईरानी तेल की बिक्री को आसान बनाया है। इससे हुई आय से ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स कुद्स फोर्स (आईआरजीसी-क्यूएफ) और रक्षा मंत्रालय एवं सशस्त्र बल रसद (एमओडीएएफएल) को लाभ हुआ है।
हालांकि चाबहार बंदरगाह की रियायतों को खत्म करने का एक और बड़ा कारण है ये भी है कि अमेरिका चाबहार बंदरगाह पर छूट अफगानिस्तान को मदद देने के लिए दी थी, लेकिन 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार आ गई। इसके बाद से अमेरिका की अफगान नीति में भी बदलाव आया है।
अमेरिका के इस कदम का भारत पर क्या असर होगा?
अमेरिका के इस फैसले का असर भारत पर भी पड़ेगा। चाबहार सिर्फ भारत के सबसे पास ईरानी बंदरगाह ही नहीं है, बल्कि यह समुद्री दृष्टि से भी एक बेहतरीन जगह पर स्थित है। इस बंदरगाह का इस्तेमाल भारत और ईरान द्वारा कनेक्टिविटी और व्यापार संबंधों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है।
रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने अमेरिका के चाबहार फैसले पर एक्स पर लिखा, “ट्रंप प्रशासन ने भारत पर शिकंजा कसा है। भारतीय सामन पर 50% टैरिफ लगाने से संतुष्ट न होकर, अब उसने चाबहार पोर्ट पर छूट खत्म कर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। चाबहार पोर्ट भारत के लिए पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का रणनीति विकल्प है। विडंबना यह है कि भारत ने एक बार ट्रंप के पहले कार्यकाल के प्रतिबंधों का पालन करने के लिए ईरान से सभी तेल आयात रोककर अपने हितों को नजरअदांज किया था। भारत के इस कदम से सबसे बड़ा फायदा चीन को मिला। चीन ईरान के कच्चे तेल का लगभग एकमात्र खरीदार बन गया। ट्रंप के "अधिकतम दबाव" का मतलब हमेशा बीजिंग के लिए ज्यादा फायदा देना होता है, और इसकी कीमत हमेशा भारत को चुकानी पड़ती है।"
जियो पॉलिटिक्स और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकर जोरावर दौलत सिंह ने चाबहार पोर्ट पर प्रतिबंध खत्म करने के बारे में एक्स पर लिखा, “ऐसा शायद ही कोई उदाहरण हो, जब कोई उभरती ताकत, भ्रम में फंसकर अपने ही तथाकथित रणनीतिक साझेदार से कमजोर साबित हुई हो। चीन को रोकने के लिए भारत के उठाए कदम अब भारत पर उल्टे पड़े हैं।"