शनि का चंद्रमा एनसेलाडस आकार में भले ही छोटा हो, लेकिन उसका विद्युतचुंबकीय प्रभाव वैज्ञानिकों की उम्मीद से कहीं ज्यादा दूर तक फैला हुआ है। नासा के कैसिनी मिशन से मिले आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने एनसेलाडस से जुड़ी विद्युतचुंबकीय तरंगों की संरचना का पता कम से कम 5.04 लाख किलोमीटर दूर तक लगाया है। यह दूरी एनसेलाडस के व्यास की करीब एक हजार गुना है और पृथ्वी से चंद्रमा की सामान्य अधिकतम दूरी से भी ज्यादा है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इसे किसी ठोस पदार्थ या बर्फ के रूप में नहीं देखा है। यह शनि के चुंबकीय क्षेत्र और आवेशित कणों यानी प्लाज्मा के बीच होने वाली जटिल विद्युतचुंबकीय गतिविधि है। अध्ययन में इसे एल्फवेन विंग से जुड़ी तरंग संरचना के रूप में पहचाना गया है।
एनसेलाडस की बर्फीली फुहारें बदलती हैं शनि का प्लाज्मा वातावरण
एनसेलाडस का व्यास करीब 504 किलोमीटर है। इसके दक्षिणी ध्रुव के पास मौजूद दरारों से लगातार जलवाष्प, बर्फ के कण और अन्य पदार्थ अंतरिक्ष में निकलते रहते हैं। इनमें से कुछ कण आवेशित होकर शनि के चारों ओर मौजूद प्लाज्मा में शामिल हो जाते हैं। इससे एनसेलाडस की कक्षा के आसपास प्लाज्मा का एक व्यापक क्षेत्र बनता है।शनि का चुंबकीय क्षेत्र इस प्लाज्मा को अपने साथ घुमाता है। जब यह प्रवाह एनसेलाडस से टकराता है तो उसके आसपास चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव और विद्युत धाराएं पैदा होती हैं। इसी प्रक्रिया से एल्फवेन तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के साथ बहुत दूर तक फैल सकती हैं।
कैसिनी के आंकड़ों से सामने आई विशाल तरंग संरचना
शोधकर्ताओं ने कैसिनी के संग्रह से 36 घटनाओं का विश्लेषण किया। इनमें 13 ऐसी उड़ानों से जुड़ी थीं, जो एनसेलाडस के बेहद करीब से गुजरने के लिए विशेष रूप से निर्धारित नहीं थीं। इन दूर की उड़ानों ने वैज्ञानिकों को एनसेलाडस से काफी दूर मौजूद तरंग संरचना को समझने में मदद की।कैसिनी के चुंबकीय क्षेत्र संबंधी उपकरणों ने तरंगों की गतिविधि और उनकी दिशा का संकेत दिया, जबकि कणों को मापने वाले उपकरणों ने एनसेलाडस से जुड़े इलेक्ट्रॉनों और आयनों की मौजूदगी दर्ज की। दोनों तरह के आंकड़ों को मिलाकर वैज्ञानिक मुख्य एल्फवेन विंग के साथ उन तरंगों की भी पहचान कर सके, जो शनि के वातावरण से परावर्तित होकर वापस लौटती हैं।शोध के मुताबिक एनसेलाडस के पास तरंगों की शक्ति सबसे ज्यादा थी और दूरी बढ़ने के साथ इसमें तेजी से कमी आई। करीब 100 एनसेलाडस त्रिज्या के बाद इसकी शक्ति 100 गुना से अधिक घट गई। इसके बावजूद दूर तक सुसंगत संकेत मिलते रहे।सबसे दूर के आंकड़े करीब 120 डिग्री डाउनस्ट्रीम क्षेत्र से मिले। इनके आधार पर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि एनसेलाडस से जुड़ी यह विद्युतचुंबकीय संरचना कम से कम 2,000 एनसेलाडस त्रिज्या, यानी करीब 5.04 लाख किलोमीटर तक फैली हुई है।
5.04 लाख किमी अंतिम सीमा नहीं
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि 5.04 लाख किलोमीटर इस प्रभाव की अंतिम सीमा नहीं है। कैसिनी ने इतनी दूरी तक लगातार एक ही तरंग का पीछा नहीं किया था। अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्थानों से मिले आंकड़ों को मिलाकर इस संरचना की पहुंच का अनुमान लगाया गया है। इसलिए इसे एक न्यूनतम प्रमाणित दूरी माना जा रहा है। संभव है कि एनसेलाडस का विद्युतचुंबकीय प्रभाव इससे भी आगे तक मौजूद हो।यह खोज यह साबित नहीं करती कि एनसेलाडस के भूमिगत महासागर से निकला पदार्थ 5.04 लाख किलोमीटर तक पहुंचता है या वहां जीवन के संकेत मौजूद हैं। इसका महत्व इस बात में है कि केवल 504 किलोमीटर चौड़ा एनसेलाडस शनि के विशाल चुंबकीय और प्लाज्मा वातावरण में इतनी दूर तक मापे जा सकने वाले बदलाव पैदा कर सकता है।
एनसेलाडस इतना खास इसलिए
व्यास: करीब 504 किलोमीटर
विशेषता: दक्षिणी ध्रुव की दरारों से जलवाष्प और बर्फीले कणों की फुहारें निकलती हैं।
अंदर क्या है: वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी बर्फीली सतह के नीचे वैश्विक भूमिगत महासागर मौजूद है।
विद्युतचुंबकीय असर: कैसिनी के आंकड़ों में एनसेलाडस से जुड़ी एल्फवेन तरंग संरचना कम से कम 5.04 लाख किलोमीटर दूर तक दर्ज हुई।
सबसे अहम बात: यह दूरी एनसेलाडस के व्यास से करीब 1,000 गुना है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि एनसेलाडस से निकला पदार्थ इतनी दूर तक पहुंच रहा है। यह शनि के चुंबकीय क्षेत्र और आवेशित कणों के बीच बनने वाली विद्युतचुंबकीय गतिविधि है।