औद्योगीकरण से पहले के मुकाबले आज वायु में कार्बन की मौजूदगी 50 फीसदी तक बढ़ चुकी है। यह दावा विश्व मौसम विज्ञान संगठन के ग्रीन हाउस गैस बुलेटिन में किया गया है। इसके अनुसार पृथ्वी पर अब तक की सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैस साल 2018 में रिकॉर्ड की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पृथ्वी को जो नुकसान हो रहा है, उसे कम करने की समय सीमा तेजी से खत्म हो रही है।
इस रिपोर्ट के लिए 53 देशों से आंकड़े जमा किए गए थे। इनके आधार पर पृथ्वी पर जो हालात सामने आए वे बीते दसियों लाख साल के इतिहास में कभी नहीं होने का अनुमान है। संगठन के महासचिव पैट्री टालस के अनुसार 20 से 50 लाख वर्ष पहले संभव है कि पृथ्वी के वातावरण में इतनी कार्बन थी। लेकिन आज यह जिस तेजी से बढ़ रही है, इसे रोकने के अवसर और समय भी खत्म होते जा रहे हैं।
इतना आया फर्क
औद्योगीकीकरण से पहले (साल 1850 से 1900) वातावरण में 280 पीपीएम (प्रति दस लाख के भाग में) कार्बन थी। साल 2018 में यह 407.8 पीपीएम दर्ज हुई। यानी हवा में सीधे 50 प्रतिशत कार्बर की वृद्धि हुई है।
वृद्धि भी सबसे तेज
साल 2017 में कार्बन का वैश्विक औसत 405.5 पीपीएम था, जो 2.03 पीपीएम बढ़ा है। 1985 से 1995 के बीच सालाना औसतन 1.42 पीपीएम वृद्धि हुई थी। 1995 से 2005 में 1.86 और 2005 से 2015 के बीच 2.06 पीपीएम कार्बन सालाना बढ़ा।
2019 में 415 पार करने की आशंका
साल 2019 के लिए आशंका है कि कार्बन का स्तर 410 के पार जा सकता है। अभी से कई मौसम केंद्रों पर इसे 415 के स्तर पर दर्ज किया जा रहा है।
खतरे और भी हैं
मीथेन व नाइट्रस ऑक्साइड भी हवा में बढ़ा है। 2018 में मीथेन 1859 पीपीबी (प्रति 100 करोड़ के भाग में) है, जो साल 1900 के मुकाबले 2.5 गुना अधिक है। इसी तरह नाइट्रस ऑक्साइड भी 331.1 पीपीबी दर्ज हुआ।
ऐसे सामने आ रहे नुकसान
सबसे बड़ा नुकसान जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आ रहा है। 50 लाख वर्ष पूर्व जब पृथ्वी के वातावरण में कार्बन 400 पीपीएम से अधिक थी तो तापमान आज के मुकाबले 2-3 डिग्री सेल्सियस अधिक था। समुद्र का स्तर भी आज के बनिस्बत 10 से 20 मीटर ऊंचा हो गया था। फिर वही हालात होने पर समुद्र के किनारों पर बसे शहरों और टापुओं के डूबने का खतरा है। मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड से जीवन और ओजोन की परत को नुकसान हो रहा है।