यूरोप में तेज गर्मी से करीब 2,300 लोगों की मौत हुई। वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से लगभग 1,500 मौतें इंसानों द्वारा फैलाए गए जलवायु परिवर्तन की वजह से हुईं। अध्ययन में बताया गया कि भीषण गर्मी का असर सबसे ज्यादा बुजुर्गों पर दिखा। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया कि अगर इंसानों ने पिछले सौ वर्षों में तेल, कोयला और गैस न जलाए होते, तो ये मौतें नहीं होतीं।
यूरोप में हाल ही के दिनों में भीषण गर्मी का प्रकोप देखने को मिला। इसके चलते लगभग 1500 लोगों की मौत होने की भी खबर भी सामने आई। अब इस मामले में वैज्ञानिकों ने एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है। इसके तहत गर्मी के चलते हुई मौतों के लिए इंसानों द्वारा फैलाया गया जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है। इंपीरियल कॉलेज लंदन और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने एक त्वरित अध्ययन में बताया कि 23 जून से 2 जुलाई 2025 के बीच यूरोप के 12 बड़े शहरों में गर्मी से लगभग 2,300 लोगों की मौत हुई, जिनमें से करीब 1,500 मौतें केवल जलवायु परिवर्तन के कारण हुईं। यानी अगर इंसानों ने पिछले सौ वर्षों में तेल, कोयला और गैस न जलाए होते, तो ये मौतें नहीं होतीं।
ग्रीनहाउस गैसों की खामोश मार
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार जून 2025 में यूरोप ने दो गंभीर हीटवेव झेलीं। पहली लहर 17 से 22 जून के बीच और दूसरी 30 जून से 2 जुलाई तक, जिसने तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया। पश्चिमी यूरोप में जून का महीना अब तक का सबसे गर्म रहा, जिसमें सतह के पास तापमान 2.81 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा। स्पेन के कुछ हिस्सों में तापमान 45 डिग्री तक पहुंच गया।रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, गैस और पेट्रोलियम के दहन से तापमान में औसतन 4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हुई है, जिससे हीटवेव से होने वाली मौतें तीन गुना तक बढ़ गई हैं।