ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे को बुधवार को ब्रेक्जिट योजना पर नेतृत्व की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। मे के सम्मुख ब्रेक्जिट मामले में चुनौतियां तब शुरू हुईं जब संसद के 48 कंजर्वेटिव सदस्यों ने 1922 की समिति के समक्ष वोट मांगने के लिए पत्र प्रस्तुत किए। थेरेसा मे ने प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद ही 2016 में यूरोपीय संघ छोड़ने के लिए वोट किया था जिसकी वजह से उनकी पार्टी में काफी आलोचना भी हुई थी।
इससे पहले थेरेसा मे सोमवार को आखिरी बार ब्रेक्जिट पर अपने फैसले को लेकर सांसदों को मनाने की कवायद शुरू की थी। लेकिन इसका कुछ खास रिस्पांस नहीं मिला। ब्रेक्जिट ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने की प्रक्रिया है। इसी मुद्दे पर थेरेसा मे प्रधानमंत्री बनी हैं। थेरेसा ने नवंबर में ब्रसेल्स में अलगाव से संबंधित एक महत्वपूर्ण दस्तावेज पर दस्तखत किए थे।
पिछले महीने ब्रसेल्स के साथ हस्ताक्षर किए गए मसौदे पर मंगलवार को संसद में उनकी सरकार को हार का सामना करना पड़ा है। यह मसौदा इस आधार को लेकर था, जिसके बदौलत 46 साल बाद द्वीप राष्ट्र अपने मुख्य व्यापारिक भागीदार का साथ छोड़ने वाला है।
इस एक बड़ी हार के बाद मे को उनकी कंजर्वेटिव पार्टी और विपक्षी लेबर पार्टी दोनों से झटका लग सकता है। इससे ब्रेक्जिट प्रक्रिया में भी देरी देखने को मिल सकती है।