ब्रिटेन में निजीकरण का हाल यह है कि देश में 70 प्रतिशत से अधिक पानी पर आज इन्वेस्टमेंट फर्मों, प्राइवेट इक्विटी फर्मों, पेंशन फंड्स और टैक्स हैवेन्स से कारोबार करने वाले बिजनेस घरानों का मालिकाना कायम हो गया है। चौंकाने वाली यह बात अखबार द गार्जियन के एक रिसर्च से सामने आई है।
ब्रिटिश सरकार ने तीन दशक पहले पानी का निजीकरण कर दिया था। तब यह कहा गया कि नई व्यवस्था में आम लोग जल प्रबंधन में भागीदार होंगे। लेकिन असल में पानी बड़े निवेशकों के मुनाफे का उद्योग बन गया। एसओएएस यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के अर्थशास्त्र विभाग में रिसर्च एसोसिएट डॉ. केट बायलिस ने द गार्जियन से कहा- पानी पर स्वामित्व का ढांचा ऐसा है कि उसमें पारदर्शिता और जवाबदेही सीमित ही है।
इस रिसर्च के मुताबिक ब्रिटेन की नौ प्रमुख और छह अपेक्षाकृत छोटी पानी और सीवेज कंपनियों में लगभग 100 अन्य कंपनियों की शेयरहोल्डिंग है। 17 देशों की इन कंपनियों का आज ब्रिटेन में वॉटर इंडस्ट्री के 72 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण है। इस रिसर्च में वॉटर इंडस्ट्री के 82 फीसदी हिस्से को ही शामिल किया जा सका। इसलिए बाकी 18 प्रतिशत हिस्सा किसके नियंत्रण में है, द गार्जियन की रिसर्च से इसका पता नहीं चल सका है।
ब्रिटेन में ज्यादातर वॉटर कंपनियों का स्वामित्व निजी हाथों में है। उनमें से सिर्फ तीन- सेवर्न ट्रेंट, पेनॉन ग्रुप, और यूनाइटेड यूटिलिटीज ब्रिटेन के स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड हैं। वैसे इन कंपनियों के ज्यादातर शेयर भी कई प्रकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड्स और प्राइवेट इक्विटी फंड्स ने खरीद रखे हैं।
डॉ. केट बायलिस ने जल उद्योग के स्वामित्व ढांचे पर अकादमिक रिसर्च किया है। उन्होंने द गार्जियन से कहा कि कुछ कंपनियों का स्वामित्व ढांचा इतना जटिल और अस्पष्ट है कि यह मालूम करना मुश्किल हो जाता है कि उनका मालिक कौन है। उन्होंने कहा- ‘मैंने कुछ फंड मैनेजरों से बात की तो उन्होंने कहा कि मालिक कौन है यह आप कभी नहीं जान पाएंगी। यह सिर्फ कंपनी के अंदरूनी अधिकारी ही जान सकते हैं।’
विश्लेषकों के मुताबिक इस स्थिति में वॉटर इंडस्ट्री की जवाबदेही तय करने की मांग कहीं पहुंचेगी, इसकी कोई संभावना नहीं है। उनके मुताबिक ब्रिटेन अंधाधुंध निजीकरण की अब भारी कीमत चुका रहा है।