अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की चीन नीति के बारे में अब काफी साफ स्पष्टता बन गई है। अब उस पर चीन में सरकारी और गैर-सरकारी स्तरों पर विचार-विमर्श चल रहा है। बाइडन ने पिछले दिनों अपने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के सामने दिए भाषण में अपनी चीन नीति के कुछ पहलुओं को साफ किया था। सोमवार को टीवी चैनल सीबीएस पर प्रसारित उनके इंटरव्यू से स्थिति और भी ज्यादा स्पष्ट हुई है।
चीनी विशेषज्ञों के मुताबिक जो बाइडन के बयानों में दो बातों पर खास जोर डाला गया है। ये हैं- ‘अत्यधिक प्रतिस्पर्धा’ और ‘अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन’। चीनी विशेषज्ञों ने अत्यधिक प्रतिस्पर्धा पर अमेरिकी राष्ट्रपति के जोर का स्वागत किया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन के मुद्दे पर उन्होंने सवाल उठाया है कि अमेरिका चीन के साथ राय-मशविरे से ये नियम तय करेगा या अपने बनाए नियमों को चीन पर थोपने की कोशिश करेगा?
सीबीएस को दिए इंटरव्यू में जो बाइडन ने अपनी चीन नीति के बारे में कहा- ‘मैं इसे उस तरह नहीं लागू करने जा रहा हूं, जैसे ट्रंप ने किया। हम अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन पर ध्यान केंद्रित करने जा रहे हैं। हमें टकराव की जरूरत नहीं है, लेकिन अत्यधिक प्रतिस्पर्धा जरूर होगी। बाइडन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बातचीत के बारे में कहा- ‘हमें अभी सीधे आपस में बात करने का मौका नहीं मिला है। हमें काफी बातें करनी होंगी। मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता हूं।’ इसके बाद उन्होंने बताया कि जब वे उप राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने शी के साथ जितना वक्त गुजारा, उतना किसी और दूसरे विदेशी नेता के साथ नहीं बिताया था।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि शी और बाइडन का अतीत में कई बार संपर्क हुआ था। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच विभिन्न स्तरों पर संवाद बनाए रखना आपसी समझदारी और द्विपक्षीय संबंधों के विकास लिए लाभदायक रहा है।
चीनी विशेषज्ञों के मुताबिक चीन ने अमेरिका को आपसी सहयोग के लिए संदेश भेजे हैं। अब वह बाइडन के जवाब का इंतजार कर रहा है। इस बीच बाइडन के सार्वजनिक बयानों से उसने कुछ संकेत ग्रहण किए हैं। बाइडन के प्रतिस्पर्धा पर जोर देने के मामले में चीनी विश्लेषकों का कहना है कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा है, इसमें कोई शक नहीं है। चीनी विश्लेषक बाइडन के इस बयान से उत्साहित हैं कि वे चीन के मामले में ट्रंप जैसा रुख नहीं रखेंगे।
चीन की रेनमिन यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन जिन कैनरॉन्ग ने चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स से कहा कि बाइडन के हालिया बयानों में प्रतिस्पर्धा के हुए जिक्र का मतलब है कि अमेरिका अपनी चीजें सुधारना चाहता है और उसकी इच्छा है कि दुनिया का सिस्टम और उसूलों में भरोसा बहाल हो। उन्होंने कहा- ‘यह अच्छी खबर है। प्रतिस्पर्धा में सीमाएं और नियम पहले से तय रहते हैं, जिससे दोनों पक्ष मतभेदों को संभाल सकते हैं। जबकि टकराव से दोनों पक्ष एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए मजबूर होते हैं। टकराव के एक सीमा के बाद दोनों पक्षों के हाथ से बाहर निकल जाने की आशंका रहती है।’
ग्लोबल टाइम्स ने बाइडन के बयानों के बारे में अपने एक संपादकीय में लिखा है- ‘उन्होंने कहा है कि वे ट्रंप के रुख की जगह अंतरराष्ट्रीय नियमों पर जोर देंगे। इसलिए ये सवाल खड़ा होता है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय नियम क्या हैं? ईमानदारी की बात यह है कि चीन प्रतिस्पर्धा से नहीं डरता, चाहे यह कितनी तीखी हो। चीन हमेशा अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन को लेकर गंभीर रहा है।’
बीजिंग स्थित चाइनीज एकेडेमी ऑफ सोशल साइंसेज से जुड़े विशेषज्ञ लु शियांग ने कहा है कि प्रतिस्पर्धा के नियम दोनों पक्षों को मिल कर लिखने चाहिए। अगर अमेरिकी नियमों को चीन पर थोपने की कोशिश की गई, तो यह न्याय नहीं होगा। लु ने कहा कि पश्चिमी देशों ने जो नियम पहले बनाए थे, वे कोरोना महामारी या जलवायु परिवर्तन जैसी नई चुनौतियों का सामना करने में बेअसर या अकुशल साबित हुए हैं।
शंघाई स्थित फुदान यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर शेन यी ने पूछा है कि क्या अमेरिका के नीति निर्माता चीन के साथ मिल कर नए नियम बनाने या पुराने नियमों को सुधारने के लिए तैयार हैं? उन्होंने कहा कि विश्व व्यापार संगठन, जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हुई पेरिस संधि और ईरान परमाणु डील के पालन में जब दिक्कत आई, तो अमेरिका ने उनसे मुंह मोड़ लिया। इसलिए नए प्रशासन को यह बताना चाहिए कि क्या भविष्य में भी अमेरिका ऐसे एकतरफा फैसले करता रहेगा?
चीन में चल रही इन चर्चाओं से ऐसा लगता है कि चीन अमेरिका के नए प्रशासन के सामने मजबूती से खड़ा होने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन की चीन के सर्वोच्च राजनयिक यांग जिशी के साथ फोन पर हुई बातचीत के दौरान भी चीन का यही रुख सामने आया था।