अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने म्यांमार को अपनी काली सूची में डाल दिया है। ऐसा इस आरोप में किया गया है कि म्यांमार की सैनिक सरकार आतंकवाद को धन मुहैया करा रही है। इस तरह अब म्यांमार को उस सूची में रख दिया गया है, जिसमें इसके पहले सिर्फ ईरान और उत्तर कोरिया मौजूद हैं।
एफएटीएफ का गठन 1989 में सबसे धनी देशों के संगठन जी-7 ने किया था। ये संस्था आतंकवाद को धन मुहैया कराने वाले और व्यापक विनाश के हथियारों के प्रसार में शामिल देशों की निगरानी करती है। शुक्रवार को पेरिस में हुई अपनी बैठक में एफएटीएफ ने जहां पाकिस्तान को निगरानी के ग्रे लिस्ट से बाहर कर संदेह मुक्त घोषित कर दिया, वहीं म्यांमार को ब्लैक लिस्ट में डालने का फैसला किया।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक एफएटीएफ ने ये फैसला मुख्य रूप से म्यांमार के कशीनो (जुआ घर) और सीमा पार होने वाले ‘अवैध’ व्यापार के कारण लिया है। आरोप है कि इन दोनों गतिविधियों में अंतरराष्ट्रीय अपराधी शामिल हो गए हैं, जो ड्रग्स और गैम्बलिंग (जुआ) के धंधों में लगे हुए हैं।
इस फैसले के एलान करते हुए एफएटीएफ के अध्यक्ष राजा कुमार ने कहा- ‘ये फैसला इसिलए लिया गया है, क्योंकि म्यांमार ने मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद को धन मुहैया कराने को रोकने के लिए मौजूद व्यवस्था का उल्लंघन किया है। इसीलिए एफएटीएफ दुनिया भर के देशों से अपील करता है कि म्यांमार से कारोबारी संबंध बनाने और किसी प्रकार का लेन-देने करने में वे पूरी सावधानी बरतें।’ राजा कुमार सिंगापुर के अधिकारी हैं और इसी वर्ष एक जुलाई को उन्होंने इस एजेंसी के अध्यक्ष का पद संभाला है।
म्यांमार को इसके पहले भी लंबे समय एफएटीएफ के ब्लैक लिस्ट में रखा गया था। 2016 में उसे ब्लैक लिस्ट से ग्रे लिस्ट में लाया गया। उसी वर्ष तत्कालीन सैनिक शासक थीन सीन ने आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) के नेतृत्व में बनी निर्वाचित सरकार को सत्ता सौंपी थी। फरवरी 2021 में सैनिक शासन की वापसी के बाद म्यांमार पर फिर निगरानी बढ़ा दी गई, जिसका नतीजा अब उसे फिर से ब्लैक लिस्ट में डालने के रूप में आया है।
म्यांमार के एक विश्लेषक के मुताबिक इस फैसला को सैनिक शासन की कड़ी आलोचना के रूप में देखा जाएगा। इससे देश की राजसत्ता और अर्थव्यवस्था को संचालित करने सेना की साख पर बट्टा लगेगा। इससे यह भी जाहिर हुआ है कि सैनिक जनरलों ने किस हद तक देश के सेंट्रल बैंक का दुरुपयोग किया है।
विश्लेषकों ने कहा है कि एफएटीएफ के इस फैसले से म्यांमार की पीड़ित जनता के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता मुहैया कराना और कठिन हो जाएगा। देश में कारोबारी समुदाय पहले से ही परेशान है। अब उसकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
हांगकांग सरकार के पूर्व अधिकारी और म्यांमार विशेषज्ञ माइकल एन.जी. ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- इस फैसले से म्यांमार के सैनिक शासन के लिए विदेशी मुद्रा का प्रबंधन और मुश्किल हो जाएगा। उधर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए म्यांमार से कारोबार करना कठिन हो जाएगा। ऐसा करने पर उन पर प्रतिबंध लगने का खतरा रहेगा। साथ ही उससे उनकी प्रतिष्ठा भी कलंकित होगी।