फ्रांस में एफिल टावर में हुई घटना पर गहराया विवाद।
- फोटो : अमर उजाला
फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित एफिल टावर अपनी खूबसूरती और लोहे से बने लंबे ढांचे के लिए दुनियाभर में पसंद किया जाता है। हर दिन हजारों की संख्या में पर्यटक इसे देखने पहुंचते हैं। हालांकि, इस सोमवार (7 सितंबर) को एफिल टावर हड़ताल की वजह से पूरे दिन के लिए बंद रहा। इसकी वजह किसी तरह की वेतन या छुट्टियों से जुड़ी मांग नहीं, बल्कि धार्मिक संस्था- बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण (बीएपीएस या BAPS) से जुड़ी एक घटना रही। इस हड़ताल और एफिल टावर की बंदी का असर यह हुआ कि फ्रांस सरकार की मंत्री को भी इस मामले में बयान देना पड़ गया।
आइये जानते हैं कि फ्रांस के एफिल टावर में ऐसा क्या हुआ कि यहां हड़ताल शुरू हो गई? इस घटना से बीएपीएस का क्या लेना-देना है? यह संस्था क्या है और इसका इतिहास क्या रहा है? पहले कब-कब बीएपीएस विवाद में घिरी है? आइये जानते हैं...
एफिल टावर में क्या हुई घटना?
एफिल टावर में जिस बात को लेकर विवाद शुरू हुआ, उस घटना के केंद्र में सनातन धर्म की वैष्णव शाखा को मानने वाली बीएपीएस है।
दरअसल, हुआ कुछ यूं कि...
- शनिवार (5 सितंबर) को बीएपीएस से जुड़े लगभग 100 लोगों का एक धार्मिक प्रतिनिधिमंडल एफिल टॉवर के निजी दौरे पर आया। प्रतिनिधिमंडल ने टॉवर का संचालन करने वाली कंपनी एसईटीई से अनुरोध किया था कि दौरे को इस तरह व्यवस्थित किया जाए, जिससे महिलाओं के साथ उनका संपर्क सीमित रहे।
- संचालक कंपनी ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। इसके बाद शनिवार को ही ड्यूटी पर तैनात एफिल टॉवर की महिला कर्मचारियों और वहां काम करने वाली महिला ठेकेदारों को प्रबंधन की तरफ से लिखित व मौखिक निर्देश दिए गए।
- महिला कर्मचारियों को उनकी नियमित काम करने की जगह से हटने और दूसरे क्षेत्रों में शिफ्ट किया गया। उनकी जगहों पर पुरुष सहकर्मियों को तैनात कर दिया गया, ताकि प्रतिनिधिमंडल का महिलाओं से संपर्क सीमित रहे।
- महिला कर्मचारियों को निर्देश दिए गए थे कि जब तक बीएपीएस का प्रतिनिधिमंडल वहां मौजूद है, वे कुछ खास रास्तों या क्षेत्रों से न गुजरें। यहां तक कि दौरे के कुछ हिस्सों, जैसे तीसरी मंजिल पर प्रतिनिधिमंडल के साथ सिर्फ पुरुष कर्मचारी ही मौजूद थे।
एफिल टावर पर एक घटना को लेकर शुरू हुआ विवाद।
- फोटो : अमर उजाला
एफिल टावर को बंद करने की नौबत क्यों आ गई?
- सोमवार सुबह कर्मचारियों ने एक आपात बैठक की। बैठक के दो एजेंडे थे। पहला- प्रबंधन से इस व्यवहार पर बात करना और दूसरा- सुनिश्चित करना कि भविष्य में इस कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ भेदभाव दोबारा न हो।
- इस बैठक के तुरंत बाद कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से काम बंद कर दिया और हड़ताल पर चले गए। इसकी वजह से सोमवार को पर्यटकों के लिए एफिल टॉवर को पूरी तरह बंद करना पड़ा।
- एफिल टावर जैसे एक राष्ट्रीय स्मारक के बंद होने और महिलाओं के साथ हुए इस भेदभाव की खबर सार्वजनिक होते ही फ्रांस में राजनीतिक तूफान आ गया। कई नेताओं ने भी इस पर टिप्पणी की।
एफिल टावर विवाद पर प्रतिक्रियाएं।
- फोटो : अमर उजाला
महिलाओं को कार्यस्थल से हटाने वाली कंपनी ने क्या सफाई दी?
एफिल टॉवर का संचालन करने वाली कंपनी- सोसाइटी डी एक्सप्लॉइटेशन डे ला टूर एफिल (एसईटीई) ने विरोध के बाद इस मामले में माफी मांगते हुए सफाई भी दी। कंपनी ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया कि भारत से आए स्वामीनारायण संप्रदाय के प्रतिनिधिमंडल ने उनके दौरे को इस तरह से आयोजित करने का अनुरोध किया था, जिससे महिलाओं के साथ उनका संपर्क सीमित रहे। प्रबंधन ने माना कि उन्हें यह मांग कभी स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी।
एफिल टावर की प्रबंधक कंपनी।
- फोटो : अमर उजाला
बीएपीएस ने इस पूरे विवाद पर क्या कहा?
बीएपीएस संस्था ने इस पूरे विवाद पर एक आधिकारिक बयान जारी कर अपना रुख स्पष्ट किया और खेद व्यक्त किया। संगठन ने बताया कि उनकी इस यात्रा का आयोजन एफिल टॉवर के प्रबंधन के साथ तालमेल बिठाकर पहले ही तय किया गया था। बीएपीएस ने कहा, "हमारे प्रतिनिधिमंडल के बड़े आकार को देखते हुए और दूसरों को असुविधा से बचाने के लिए यह दौरा एफिल टॉवर की टीम के समन्वय से खुलने के सामान्य समय की शुरुआत में आयोजित किया था।"
संस्था ने कहा कि जहां तक हमारी जानकारी है, किसी भी समय किसी को भी एफिल टॉवर में प्रवेश करने से नहीं रोका गया था।
एफिल टावर विवाद पर बीएपीएस का बयान।
- फोटो : अमर उजाला
क्या है बीएपीएस, इसका इतिहास क्या?
बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था है। यह हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय की स्वामीनारायण परंपरा से जुड़ी एक प्रमुख वैश्विक आध्यात्मिक और सामाजिक संस्था है। मौजूदा समय में यह संस्था दुनियाभर में 1,300 से ज्यादा पारंपरिक हिंदू मंदिरों और 5,025 से ज्यादा केंद्रों का संचालन करती है। इसके सेवा कार्यों में धार्मिक कार्यक्रमों के अलावा शिक्षा, युवाओं और परिवारों के लिए कल्याणकारी योजनाएं, सांस्कृतिक कार्य, सामुदायिक सेवा और मानवीय राहत पहल शामिल हैं।
स्थापना (1907)
इस संस्था की नींव साल 1907 में शास्त्रीजी महाराज ने रखी थी। उन्होंने गुजरात के बोचासन गांव में पहले स्वामीनारायण मंदिर का निर्माण कराया था, जिसकी वजह से इस संस्था को 'बोचासनवासी' नाम मिला।
वैश्विक विस्तार
गुजरात के एक छोटे से गांव से शुरू हुई यह संस्था धीरे-धीरे पूरे भारत के साथ-साथ उत्तरी अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप तक फैल गई। इस संस्था की मुख्य पहचान इसके पारंपरिक नक्काशीदार पत्थरों से बने विशाल और भव्य मंदिरों से है।
कैसे पूरी दुनिया में फैल गए बीएपीएस के मंदिर?
अक्षरधाम, गांधीनगर (1992): यह पहला भव्य अक्षरधाम परिसर था, जिसका उद्घाटन 1992 में तत्कालीन गुरु प्रमुख स्वामी महाराज ने कराया था।
स्वामीनारायण अक्षरधाम, दिल्ली (2005): इसका उद्घाटन 6 नवंबर 2005 को हुआ। यह मंदिर अपनी भव्य नक्काशी, बगीचों, प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक आकर्षणों के लिए जाना जाता है।
अक्षरधाम, न्यू जर्सी, अमेरिका (2023): यह परिसर न्यू जर्सी के रॉबिंसविले में लगभग 183 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इसे बनाने में लगभग 12 साल (2011 से 2023) का लंबा समय लगा था।
बीएपीएस हिंदू मंदिर, अबू धाबी (2024): यह पश्चिम एशिया में पारंपरिक पत्थरों से बना पहला हिंदू मंदिर है। इस परियोजना के लिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की सरकार ने अबू मुरीखा क्षेत्र में 17.5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई थी।
फ्रांस मंदिर, बस्सी-सेंट-जॉर्जेस (2026): हाल ही में पेरिस से लगभग 30 किलोमीटर दूर यूरोप का सबसे बड़ा पारंपरिक शैली का स्वामीनारायण हिंदू मंदिर खोला गया है, जिसके उद्घाटन समारोह के सिलसिले में ही यह प्रतिनिधिमंडल फ्रांस के दौरे पर था।
बीएपीएस के महिलाओं को लेकर सख्त नियम क्यों?
- बीएपीएस के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों या स्वामियों के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करने के सख्त नियम हैं, जिसके तहत वे महिलाओं से सीधे संपर्क में नहीं आ सकते और न ही उनके सामने उपस्थित हो सकते हैं।
- इस वैचारिक नियम को लेकर इतिहास में विभाजन भी हो चुका है। 1960 के दशक की शुरुआत में हरिप्रसाद स्वामी और उनके कुछ अनुयायी महिला शिष्यों को भी दीक्षा दिलाना चाहते थे।
- हालांकि, तत्कालीन बीएपीएस गुरु योगीजी महाराज ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बाद हरिप्रसाद स्वामी 1966 में बीएपीएस से अलग हो गए। उन्होंने सोखड़ा संप्रदाय का गठन किया, जिसमें महिलाओं को भी स्वीकार किया गया।
पहले कब विवादों में रही है बीएपीएस?
केरल पुस्तक विमोचन (2015): एपीजे अब्दुल कलाम की किताब ट्रांसेंडेंस के मलयालम अनुवाद विमोचन कार्यक्रम को इसलिए रद्द करना पड़ा था, क्योंकि अनुवादक श्रीदेवी कार्था को मंच पर बैठने से मना किया गया था। इसकी वजह यह थी कि बीएपीएस स्वामी महाराज के आश्रम के प्रतिनिधि उपस्थित होने वाले थे।
कोलकाता विवाद (2024): कोलकाता में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (आईसीएआई) के एक कार्यक्रम में बीएपीएस के संत स्वामी ज्ञानवत्सल के भाषण से ठीक पहले आगे बैठी महिला सदस्यों और लड़कियों को पीछे हटने के निर्देश दिए गए थे, जिससे विवाद छिड़ गया था।
न्यू जर्सी विवाद (2021): संस्था के न्यू जर्सी (रॉबिंसविले) मंदिर निर्माण में लगे भारतीय श्रमिकों खासकर दलित वर्ग के लोगों, की मजदूरी और काम के घंटों के संबंध में अमेरिकी संघीय कानून के तहत कथित शोषण और बंधुआ मजदूरी के आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया गया था। हालांकि, बीएपीएस ने इन सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा था कि ये लोग केवल कुशल कारीगर थे।