बांग्लादेश रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) समझौते में शामिल होने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। ये मुक्त व्यापार समझौता इस साल के आरंभ से अमल में आ चुका है। इसमें 15 देश शामिल हैं, जिनके बीच सालाना आपसी कारोबार लगभग 13 ट्रिलियन डॉलर का है। बांग्लादेश को उम्मीद है कि इसमें शामिल होने से उसे काफी आर्थिक लाभ होगा।
आरईसीपी में शामिल होने के समझौते पर नवंबर 2020 में 15 देशों ने दस्तखत किए थे। इनमें चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड के अलावा आसियान के सदस्य दस देश शामिल हैं। तब इस बात की तरफ दुनिया का ध्यान गया था कि इस समझौते में शामिल हुए देशों की कुल आबादी 2 अरब 20 करोड़ से ज्यादा है। साथ ही उनका साझा सालाना जीडीपी 26.2 ट्रिलियन डॉलर है। भारत भी आरंभ से इस करार के लिए हो रही वार्ता में शामिल था, लेकिन ऐन वक्त पर उसने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया।
बीटीटीसी ने कहा है कि आरसीईपी का हिस्सा बनने पर बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग का निर्यात तेजी से बढ़ेगा। लेकिन कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें नुकसान होगा। वैसे कुल मिला कर आरसीईपी में शामिल होने पर बांग्लादेश के निर्यात में 17.37 फीसदी की वृद्धि होगी। मगर इसका यह परिणाम भी होगा कि बांग्लादेश के आयात में 14.46 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाएगी। इसकी वजह यह है कि बांग्लादेश को कई वस्तुओं पर से आयात शुल्क हटाना होगा।
थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग से जुड़े विशेषज्ञ मुस्तफिजुर रहमान के मुताबिक बांग्लादेश को देर-सबेर आरसीईपी में शामिल होना ही होगा, लेकिन उसके पहले अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठा लेना उचित होगा। उन्होंने बांग्लादेश के अखबार द बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा- ‘आरईसीपी के नियमों के अनुरूप हमें अपना स्टैंडर्ड बढ़ाना होगा। अगर हमने प्राइवेट सेक्टर के उत्पादकता कौशल को नहीं बढ़ाया, तो आरसीईपी में शामिल होने के कारण कपड़ा को छोड़ कर बाकी कई क्षेत्रों में हमें नुकसान होगा।’