1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। हालांकि, 21वीं सदी के अधिकतर हिस्से में भारत-बांग्लादेश परस्पर सहयोगी रहे हैं। शेख हसीना के नेतृत्व में (2009-2024) के बीच बांग्लादेश सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर में फैले उग्रवाद को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई। खासकर उल्फा और एनडीएफबी जैसे संगठन, जो कभी बांग्लादेश से सप्लाई होने वाले हथियारों के जरिए भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देते थे, उनकी गतिविधियों को रोकने में खासी सफलता हासिल हुई। बांग्लादेश की तरफ से इस तरह के कूटनीतिक सहयोग में किसी तरह का बदलाव भारत के उत्तर में स्थित क्षेत्र के लिए सुरक्षा का मुद्दा बन सकता है।
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बांग्लादेश में चार पार्टियां मुख्य तौर पर मुकाबले में हैं। हालांकि, इसमें अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की आवामी लीग शामिल नहीं है। दरअसल, बीते साल जब हसीना के शासन के खिलाफ छात्र आंदोलन हिंसक हो गया तब वे बांग्लादेश छोड़कर भारत आने को मजबूर हो गईं। इसके बाद बांग्लादेश में बनी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने कट्टरपंथी ताकतों के दबाव में न सिर्फ आवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया, बल्कि शेख हसीना के खिलाफ उनकी गैरमौजूदगी में कई केस भी चलवाए। इनमें से एक केस का फैसला इसी साल नवंबर में आया, जिसमें अपदस्थ पीएम को मौत की सजा सुनाई गई। चूंकि शेख हसीना भारत में हैं, इसलिए उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। बांग्लादेश में यह भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है।
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