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बांग्लादेश में राजनीति कितनी बदली: बीते आम चुनावों के नतीजे क्या, हिंसा के बीच 2026 में कैसी है सियासी बयार?

Thu, 12 Feb 2026 11:48 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

बांग्लादेश का राजनीतिक इतिहास क्या है, देश के अब तक कितने राष्ट्राध्यक्ष रहे हैं और कौन-कौन? बांग्लादेश का चुनावी इतिहास क्या रहा है? बीते चुनावों में क्या नतीजे रहे थे? इन चुनावों में सर्वेक्षणों का क्या कहना है? आइये जानते हैं...
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बांग्लादेश में आम चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। देश पर सबसे लंबे समय तक राज करने वाली दो बेगम- शेख हसीना और खालिदा जिया का इन चुनावों में नहीं हैं। जहां अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना मौजूदा समय में भारत में निर्वासित हैं और उनकी पार्टी को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया गया है, तो वहीं खालिदा जिया का हाल ही में निधन हो गया।
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इस बीच बांग्लादेश में हालात भी तेजी से बदले हैं। यहां शेख हसीना के हटने के बाद से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार भी इन हिंसा की घटनाओं को रोकने में असफल साबित हुई है। फिर चाहे सरेआम दीपू दास की लिंचिंग की घटना हो या एक दिन पहले हिंदू व्यापारी सुषेन चंद्र सरकार की धारदार हथियार से हत्या की घटना। इन हालात में बांग्लादेश में काफी संवेदनशील माहौल में चुनाव कराए जा रहे हैं।

कुछ और पार्टियों ने तेजी से लोकप्रियता बटोरी है। इनमें इस्लामावादी पार्टी- जमात-ए-इस्लामी प्रमुख है। इसके अलावा जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों की बनाई पार्टी- नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) भी तेजी से युवाओं के बीच चर्चा में आई है। ये चुनाव एकतरफ या दो-तरफा भी नहीं बल्कि चौतरफा रहने के आसार हैं। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बांग्लादेश का राजनीतिक इतिहास क्या है, देश के अब तक कितने राष्ट्राध्यक्ष रहे हैं और कौन-कौन? बांग्लादेश का चुनावी इतिहास क्या रहा है? बीते चुनावों में क्या नतीजे रहे थे? इन चुनावों में सर्वेक्षणों का क्या कहना है? आइये जानते हैं...

क्या है बांग्लादेश का राजनीतिक इतिहास, कौन रहे राष्ट्राध्यक्ष

1971 में पाकिस्तान से आजादी हासिल करने के बाद से बांग्लादेश का राजनीतिक इतिहास सैन्य हस्तक्षेप, तख्तापलट और लोकतांत्रिक बदलावों से भरा रहा है।

1. शेख मुजीबुर रहमान (1971-1975): वे देश के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता और बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति थे। उन्होंने 1975 तक शासन किया, जिसके बाद सेना के अधिकारियों द्वारा उनकी और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई थी।

2. खोंदाकर मुश्ताक अहमद और अबू सादात मोहम्मद सायेम (1975-1977): मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद कैबिनेट मंत्री खोंदाकर मुश्ताक अहमद ने सत्ता संभाली, लेकिन कुछ महीनों बाद ही उन्हें एक जवाबी तख्तापलट में हटा दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश के मुख्य न्यायाधीश अबू सादात मोहम्मद सायेम को औपचारिक राष्ट्रपति नियुक्त किया गया था।

3. जियाउर रहमान (1977-1981): मेजर जनरल जियाउर रहमान ने 1977 में राष्ट्रपति का पद संभाला और 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की। उनकी 1981 में एक असफल तख्तापलट के दौरान हत्या कर दी गई।

4. हुसैन मोहम्मद इरशाद (1982-1990): 1982 से 1990 तक बांग्लादेश में सैन्य तानाशाही रही, जिसका नेतृत्व इरशाद ने किया। लोकतांत्रिक संस्थानों के कमजोर होने के बावजूद 1990 में जन आंदोलनों के दबाव में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

5. खालिदा जिया (1991-1996 और 2001-2006): जियाउर रहमान की पत्नी और बीएनपी की नेता खालिदा जिया ने 1991 के चुनाव जीते और बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने दो कार्यकालों (1991-1996 और 2001-2006) में देश का नेतृत्व किया। 30 दिसंबर 2025 को उनका निधन हो गया।
 

6. शेख हसीना (1996-2001 और 2009-2024): शेख मुजीबुर रहमान की बेटी और अवामी लीग की नेता शेख हसीना ने पहली बार 1996-2001 तक शासन किया। इसके बाद वे 2009 में फिर सत्ता में आईं और अगस्त 2024 तक लगातार 15 वर्षों तक शासन किया। अगस्त 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के कारण उन्हें पद छोड़कर देश छोड़ना पड़ा।

7. मोहम्मद यूनुस (अगस्त 2024 - वर्तमान): शेख हसीना के पतन के बाद से, नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम प्रशासन देश का संचालन कर रहा है। इस अंतरिम सरकार में ही अगली पूर्ण सरकार की स्थापना की तैयारी चल रही है। 

8. इसके अलावा 1981-82 के बीच अब्दुल सत्तार, 1990-91 में जब बांग्लादेश राजनीतिक बदलाव से गुजर रहा था तब चीफ जस्टिस शहाबुद्दीन, 2006-07 के बीच इयाजुद्दीन अहमद, 2007-09 के बीच फखरुद्दीन अहमद ने भी राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर जिम्मेदारी निभाई। हालांकि, यह सभी अंतरिम या कार्यकारी तौर पर ही राष्ट्राध्यक्ष नियुक्त हुए। 

क्या है बांग्लादेश का चुनावी इतिहास?

बांग्लादेश का चुनावी इतिहास 1971 में स्वतंत्रता के बाद से सैन्य शासन, नागरिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक बदलावों के बीच झूलता रहा है। स्रोतों के आधार पर 1971 से अब तक का चुनावी घटनाक्रम इस प्रकार है:

1970: स्वतंत्रता से ठीक पहले
तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुए आम चुनावों में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने 162 में से लगभग सभी सीटें जीतीं। हालांकि, पाकिस्तानी सैन्य सरकार ने उन्हें सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया। कहा जाता है कि इसी के जवाब में बांग्ला भाषा और अस्मिता के लिए 1971 का मुक्ति संग्राम हुआ।

1973: आजादी के बाद पहला चुनाव 
मार्च 1973 में हुए पहले आम चुनाव में अवामी लीग ने 300 में से 293 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया। हालांकि, इस चुनाव में वोट-धांधली और विपक्षी नेताओं को डराने-धमकाने के आरोप भी लगे। 1974 में मुजीब ने सभी विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगा दिया और एक-दलीय शासन लागू कर दिया।

1979: बीएनपी का उदय 
1975 में मुजीब की हत्या के बाद सैन्य शासन का दौर रहा। 1977 में राष्ट्रपति बने जियाउर रहमान ने फरवरी 1979 में चुनाव कराए, जिसमें उनकी नई पार्टी बीएनपी ने 207 सीटें जीतीं। अवामी लीग ने इन चुनावों में धांधली का आरोप लगाया।

1986 और 1988: सैन्य तानाशाही के चुनाव 
हुसैन मोहम्मद इरशाद के सैन्य शासन के दौरान हुए ये चुनाव विवादित रहे। 1986 में इरशाद की जातीय पार्टी ने 183 सीटें जीतीं, जबकि बीएनपी ने इसका बहिष्कार किया। 1988 के चुनावों को भी 'अनुचित और हेरफेर' वाला बताया गया, जिसमें जातीय पार्टी ने 259 सीटें जीतीं।

1991: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, 'बेगम' के हाथ आई सत्ता 
बीएनपी के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों और लोकतंत्र स्थापना की मांग के बाद 1990 में इरशाद को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद एक कार्यवाहक सरकार ने चुनाव कराए। इसमें खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 140 सीटें जीतीं और वे बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

1996: शेख हसीना पहली बार बनीं पीएम
फरवरी 1996: अवामी लीग और अन्य दलों के बहिष्कार के कारण BNP ने लगभग सभी सीटें जीतीं, लेकिन व्यापक विरोध के कारण सरकार को 12 दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा।
जून 1996: एक तटस्थ कार्यवाहक सरकार की देखरेख में चुनाव हुए, जिसमें अवामी लीग ने 146 सीटें जीतीं और शेख हसीना पहली बार प्रधानमंत्री बनीं।

2001: खालिदा जिया की वापसी
कार्यवाहक सरकार के तहत हुए इस चुनाव में बीएनपी ने 193 सीटें जीतकर फिर से सत्ता हासिल की। यह दो प्रमुख दलों के बीच सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण का अंतिम उदाहरण था।




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2008: रिकॉर्ड मतदान के बीच हसीना फिर लौटीं
सैन्य-समर्थित कार्यवाहक सरकार के कारण देरी से हुए इस चुनाव में 80% मतदान हुआ। हसीना के 'ग्रैंड अलायंस' ने 230 सीटें जीतकर शानदार वापसी की।



2014 और 2018: सत्ता पर शेख हसीना की मजबूत पकड़

2014: शेख हसीना ने कार्यवाहक सरकार की अनिवार्यता को खत्म कर दिया। बीएनपी के बहिष्कार के बीच अवामी लीग ने फिर से जबरदस्त जीत दर्ज की।

2018: इसमें पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग का इस्तेमाल हुआ, लेकिन विपक्ष ने भारी धांधली के आरोप लगाए। अवामी लीग गठबंधन ने 90% से अधिक सीटें जीतीं।



2024: शेख हसीना का अंतिम कार्यकाल 
जनवरी 2024 के चुनाव का बीएनपी ने फिर बहिष्कार किया। अवामी लीग ने इसमें 272 सीटें जीतीं। हालांकि, जून-जुलाई 2024 के बीच युवाओं और छात्रों ने पहले आरक्षण और फिर शेख हसीना के शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन छेड़ दिया। यह प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गए और विद्रोह की वजह से शेख हसीना को पद छोड़कर देश छोड़ना पड़ा।

इन चुनावों में सर्वेक्षणों का क्या कहना है?
बांग्लादेश की अलग-अलग सर्वे एजेंसियों की तरफ से किए गए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में आवामी लीग की गौरमौजूदगी में वोट बंटते नजर आ रहे हैं। खासकर बीएनपी और जमात-एनसीपी गठबंधन के बीच। 



पूर्व-चुनावी सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त मिलती दिख रही है। आईआईएलडी के सर्वे के मुताबिक, बीएनपी और कुछ छोटी पार्टियों के गठबंधन को 44.1% और जमात गठबंधन को 43.9% वोट मिल सकते हैं। ईएएसडी के एक अन्य सर्वे में 66.3% मतदाताओं ने बीएनपी को अपनी पसंद बताया है।

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1. एमिनेंस एसोसिएट्स फॉर सोशल डेवलपमेंट (EASD)
41,500 लोगों की राय पर आधारित इस सर्वेक्षण में बीएनपी के लिए एक स्पष्ट बढ़त का अनुमान लगाया गया है।
 
पार्टी/गठबंधन सीट 
बीएनपी नेतृत्व वाला गठबंधन 208
जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला गठबंधन 46
निर्दलीय 17
जातीय पार्टी 3
अन्य 26
  • सर्वे में लगभग 66.3% मतदाताओं ने बीएनपी को अपनी पसंद बताया।
  • जमात-ए-इस्लामी को 11.9%, जातीय पार्टी को 4% और एनसीपी को 1.7% समर्थन मिला।
  • बीएनपी को 71.1 फीसदी महिला मतदाताओं का समर्थन दिखाया गया है। 
  • पूर्व में अवामी लीग को वोट देने वाले 80% मतदाता अब BNP के पक्ष में दिख रहे हैं।
            
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2. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी (IILD)
इस सर्वेक्षण में 63,115 मतदाताओं की राय ली गई। इसमें दोनों गठबंधनों के बीच कांटे की टक्कर का संकेत दिया गया है। इसके अलावा जातीय पार्टी के लिए महज 1.7 फीसदी वोट का अनुमान लगाया गया है।
 
पार्टी/गठबंधन सीट  वोट %
बीएनपी नेतृत्व वाला गठबंधन 101 44.1
जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला गठबंधन 105 43.9

3. नेशनलिस्ट रिसर्च सेल (एनआरसी)
यह सर्वेक्षण BNP के लिए भारी जीत का अनुमान लगाता है।
 
पार्टी/गठबंधन सीट 
बीएनपी गठबंधन 220
जमात गठबंधन     57
जमात गठबंधन     5
निर्दलीय-अन्य 18


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