करीब 50 साल पुराना यह संगठन बलूचिस्तान की आजादी के लिए बना था और अभी भी इसी मांग पर कायम है। बीएलए पर पाकिस्तानी सेना और सरकारी संस्थानों पर हमले के आरोप भी लगते रहे हैं। जानकारी के मुताबिक इस संगठन का प्रभाव एक समय इतना बढ़ गया था कि पाक में जनरल जिया उल हक ने सत्ता में रहते हुए बलूच लिबरेशन आर्मी से बात भी की थी।
माडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि बलूच लिबरेशन आर्मी में करीब छह हजार सैनिक हैं। इनमें से दो हजार सैनिकों को जंग का प्रशिक्षण हासिल है। साल 2006 के बाद बीएलए ने पाक सेना और सरकार ने बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके विभिन्न हमलों में सैकड़ों पाक सैनिकों की जान जा चुकी है। फरवरी में बीएलए के एक हमले में 20 पाक सैनिकों की मौत हुई थी।
बता दें कि बलूचिस्तान में दो प्रमुख कबीले हैं- मारी और बुगती। बीएलए पर इन्हीं दोनों का प्रभुत्व है। कहा जाता है कि कई इलाकों में इनका भय इतना ज्यादा है कि पाकिस्तानी सेना जमीन पर उतरने का साहस नहीं कर पाती, इसलिए केवल हवाई हमले करती है। कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि बीएलए के लड़ाकों को रूस की पूर्व खुफिया एजेंसी केजीबी से प्रशिक्षण मिला है।
बीएलए बलूचिस्तान की आजादी के साथ वहां चीन के दखल का भी विरोधी है। साल 2004 में जब चीन बलूचिस्तान में पैर जमाने शुरू किए थे तो बीएलए ने इसका विरोध किया था। उसने चीन के ग्वादर जैसे प्रोजेक्ट के खिलाफ आवाज उठाई। बीएलए का कहना है कि पाक चीन के साथ मिलकर उनकी संस्कृति खत्म करना चाहता है।