Ayman al-Zawahiri killed: अमेरिकी ने जारी की अल-जवाहिरी की प्रोफाइल फोटो
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अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में मारे गए अलकायदा सरगना अल जवाहिरी की मौत के पीछे पाकिस्तान और अमेरिका के बीच हुई एक बड़ी डील सामने आ रही है। दरअसल पाकिस्तानी सेना के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने अमेरिका से एक मदद की गुहार लगाई गई थी। खुफिया मामलों के जानकारों का मानना है कि उसी मदद के भरोसे के बदले अमेरिका को पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने काबुल में रह रहे अल-जवाहिरी के न सिर्फ ठिकाने का पता दिया, बल्कि काबुल से लेकर वाशिंगटन तक इस मामले जानकारियां साझा करता रहा। इस पूरी डील को लेकर अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने भी सवाल उठाए हैं।
पाक सेना चीफ बाजवा ने मांगी मदद
विदेशी मामलों पर नजर रखने वाली एजेंसियों से जुड़े खुफिया सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तानी सेना के चीफ जनरल बाजवा ने 20 जुलाई को अमेरिकी प्रशासन से संपर्क साधा था। इस दौरान जनरल बाजवा ने पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था को लेकर न सिर्फ चर्चा की थी, बल्कि आईएमएफ से जारी किए जाने वाले फंड को लेकर भी मदद करने को कहा था। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान ने आईएमएफ से तकरीबन दो बिलियन डॉलर की मदद मांगी है, जो अभी तक पाकिस्तान को जारी नहीं हुई है। पाकिस्तानी सेना के चीफ ने अपने मुल्क में बदहाली का हवाला देकर अमेरिकी सरकार से जोर देकर कहा था कि वह आईएमएफ पाकिस्तान को तकरीबन दो बिलियन डॉलर की मदद देने के लिए कहे। विदेशी मामलों में नजर रखने वाली खुफिया एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान की इस मदद पर अमेरिका ने एक शर्त रख दी। शर्त यह थी कि लंबे समय तक अफगानिस्तान में रह रही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कारिंदे उनको इस बात की जानकारी दें कि अल-कायदा चीफ इस वक्त अगर अफगानिस्तान में है तो कहां पर है।
विदेशी मामलों के जानकार और लंबे समय तक दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में खुफिया एजेंसियों के लिए काम करने वाले वरिष्ठ अधिकारी कर्नल (रि.) जेएस लांबा कहते हैं कि पाकिस्तान इस वक्त अर्थव्यवस्था के हालात पर न सिर्फ टूटा हुआ है बल्कि बर्बादी के कगार पर है। इस वक्त पाकिस्तान सरकार इस हालत में नहीं है कि वह आगे बढ़कर दुनिया से मदद मांग सके। यही वजह है कि पाकिस्तानी सेना को जहां से भी वित्तीय मदद मिलने की उम्मीद है, वहां जाकर हाथ फैला रही है। कर्नल लांबा कहते हैं कि अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में भी पाकिस्तान के सेना प्रमुख की ओर से आईएमएफ से फंड रिलीज कराने के लिए अमेरिकी मदद मांगने का जिक्र हुआ है। वह कहते हैं निश्चित तौर पर ऐसे मामलों में दो तरफा डील होती ही है। इसलिए इस बात से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता है कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में रह रहे अल-कायदा चीफ अल-जवाहिरी की पूरी सूचना पाकिस्तान की सेना और आईएसआई ने अमेरिका को लीक कर दी है।
सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान और अमेरिका की मदद के बहाने खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों की लगातार मुलाकातें भी होती रही हैं। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि आईएसआई के बड़े अधिकारियों ने बीते कुछ दिनों में न सिर्फ अमेरिका का दौरा किया, बल्कि पाकिस्तानी सेना चीफ की अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी से बातचीत भी हुई। पाकिस्तानी सेना चीफ जनरल बाजवा और अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी से हुई बातचीत की पुष्टि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी बीते शुक्रवार को की थी।
पाक सेना की शह पर काबुल आया था प्रतिनिधिमंडल
अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने काबुल में अल जवाहिरी की मौत पर पाकिस्तानी सेना की जनरल कमर जावेद बाजवा की अमेरिका से मांगी गई मदद पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पश्चिमी देशों की मदद से अफगानिस्तान में न सिर्फ सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्थाओं में अस्थिरता ला रहा है, बल्कि यह साबित करने की कोशिश भी कर रहा है कि वह किस हद तक जाकर अस्थिरता पैदा कर सकता है। सालेह ने बीते कुछ दिनों पहले पाकिस्तान से काबुल दौरा करने वाले प्रतिनिधिमंडल पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह डेलिगेशन पाकिस्तानी सेना की शह पर अफगानिस्तान आया था। पूर्व उप राष्ट्रपति सालेह ने अफगानिस्तान के हक्कानी नेटवर्क पर भी सवाल उठाए हैं।
विदेशी मामलों के जानकार और पूर्व खुफिया एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी जेएस लांबा कहते हैं कि इस बात से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता है कि पाकिस्तान ने वित्तीय मदद के बदले अल जवाहिरी की सूचना लीक की है। अफगानिस्तान में रजिस्टेंस फ्रंट से जुड़े हुए लड़ाकों ने कहा कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं। अफगानिस्तान में रजिस्टेंस फ्रंट से जुड़े लड़ाकों के मुताबिक यहां पर सिर्फ अल-कायदा का चीफ़ ही नहीं बल्कि आईएस-खोरासन के चीफ से लेकर और कई बड़े आतंकी संगठनों के मुखिया और उनके कमांडर अफगानिस्तान की जमीन पर शरण ले कर रह रहे हैं। वे कहते हैं कि आने वाले दिनों में एक बार फिर से अफगानिस्तान की धरती ऐसे ही आतंकियों से न सिर्फ भर जाएगी, बल्कि यहां की शांति और अमन कभी भी कायम नहीं रह पाएगा। उनका कहना है कि रजिस्टेंस फ्रंट की लड़ाई अफगानिस्तान में इस वक्त कब्जा करके देश में चल रही अनाधिकृत सरकार के साथ बनी हुई है।