डॉ. माइकल फलीलव
- फोटो : एएनआई
शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद चीन पूर्व और पश्चिम की सीमाओं और अन्य देशों के साथ संबंधों की ओर काफी आक्रामक हुआ है। यह बात ऑस्ट्रेलिया के एक विदेश नीति विशेषज्ञ ने कही है। उन्होंने कहा कि दुनिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही है, जो कि लंबे समय तक जारी रह सकती है।
ऑस्ट्रेलिया के लोवी इंस्टीट्यूट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. माइकल फलीलव ने दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी मेमोरियल लेक्चर के दौरान कहा कि चीन की आर्थिक उड़ान अभूतपूर्व रही है। लेकिन, एशियाई क्षेत्र की सफलता और विकास के मार्ग के लिए भारत की अर्थव्यवस्था में हुए विकास की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है।
'उभरता एशिया दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है'
उन्होंने कहा, उभरता एशिया इस समय दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है जो लगभग आधी वैश्विक वृद्धि के लिए जिम्मेदार है जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी हिस्सेदारी केवल एक तिहाई है। इसके साथ ही उन्होंने 'ऑस्ट्रेलिया, भारत और हिंद प्रशांत: रणनीतिक संकल्पना की आवश्यकता' विषय पर भी बात की।
आर्थिक परिदृश्य सकारात्मक लेकिन सुरक्षा नहीं
डॉ. माइकल ने कहा कि एशिया में आर्थिक परिदृश्य सकारात्मक दिख रहा है तो सुरक्षा के सुरक्षा के परिदृश्य में ऐसा नहीं है। अमेरिका और चीन दोनों ने ही पिछले दशक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सवाल उठाने वाले व्यवहार का प्रदर्शन किया है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहने के दौरान अमेरिका की नीतियों का आलोचना की।
'शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद बदला चीन'
उन्होंने कहा, '2012 में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी सीमाओं और अन्य देशों के साथ संबंधों पर चीन का रुख बहुत आक्रामक हुआ है।' उन्होंने कहा चीन के साथ ऑस्ट्रेलिया के संबंध इसलिए तल्ख हुए क्योंकि चीन अब बदल गया है। इसकी विदेश नीतियां सख्त हुई हैं। आलोचना सहने की क्षमता समाप्त हो गई है।