Asian Economy:Asian Currencies
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अमेरिका में ब्याज दर में और वृद्धि और इस कारण डॉलर के लगातार महंगा होने का एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था पर बहुत खराब असर हो रहा है। जापान और चीन सहित ज्यादातर देशों की मुद्राओं का भाव हाल में गिरा है। 2022 में अब तक डॉलर इंडेक्स में 13 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। 2008-09 की आर्थिक मंदी के बाद यह एक रिकॉर्ड है।
एक ताजा विश्लेषण के मुताबिक डॉलर की तुलना में जापान की मुद्रा येन की कीमत दो दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। उधर चीनी मुद्रा युवान 14 साल के सबसे निचले स्तर पर है। भारतीय मुद्रा रुपये की कीमत में भी लगभग 11 फीसदी की गिरावट आई है। दक्षिण कोरियाई मुद्रा की तुलना में डॉलर 20 फीसदी महंगा हुआ है। थाईलैंड, मलेशिया और फिलपीन्स की मुद्राएं भी दस फीसदी से ज्यादा गिरी हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस वैश्विक रूझान के कारण विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट पैदा हुआ है। अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल जी प्लमर ने एक विश्लेषण में लिखा है- ‘विश्व अर्थव्यस्था के लिए के लिए जोखिम अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है। अभी दुनिया एक सदी बाद आई वैश्विक महामारी के असर से निकल भी नहीं पाई थी कि उसे यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी जंग का सामना करना पड़ा। इससे प्राकृतिक संसाधनों का बाजार संकटग्रस्त हुआ। नतीजतन बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ऊंची महंगाई और निम्न विकास दर का शिकार हो रही हैं और इससे वैश्विक मंदी का खतरा गहरा गया है।’
वेबसाइट एशिया टाइम्स पर छपे इस विश्लेषण में कहा गया है कि वैश्विक अनिश्चय अभी जारी रहने वाला है। अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने साफ कर दिया है कि उसकी पहली चिंता महंगाई है। यानी महंगाई रोकने की कोशिश में अगर आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट आती है, तो वह ये जोखिम उठाने को तैयार हैं। इस कारण प्रो. प्लमर ने चेतावनी है कि एशियाई देशों को डॉलर महंगा होने से पैदा हो रही मुश्किलों को झेलने के लिए अभी खुद तैयार रखना चाहिए।
एशियन डेवलपमेंट बैंक ने कहा है कि मौजूदा स्थिति का निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर बहुत खराब असर हुआ है। एशियाई देशों के ज्यादातर निर्यात वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा हैं। ये सप्लाई चेन कई कारणों से लगातार कमजोर होते गए हैं।
दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के सामने एक बड़ी समस्या विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आने से पेश आई है। श्रीलंका इसी कारण से डिफॉल्टर (कर्ज चुकाने में अक्षम) हो चुका है, जबकि पाकिस्तान पर भी ये खतरा लगातार मंडरा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक इस वर्ष दक्षिण एशिया की साझा आर्थिक वृद्धि दर 6.5 फीसदी रहेगी। लेकिन ये दर भारत की बेहतर संभावनाओं के कारण ऊंची दिखती है। जबकि इस क्षेत्र के बाकी देशों की माली सूरत अच्छी नहीं है।
एशियन डेवलपमेंट बैंक ने दक्षिण पूर्व एशिया में इस साल आर्थिक वृद्धि दर 5.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। लेकिन चीन की विकास दर 3.9 फीसदी ही रह पाएगी। विश्लेषकों का कहना है कि चीन की विकास दर धीमी होने का असर पूरे एशिया पर पड़ेगा, क्योंकि वह उन देशों के आयात-निर्यात का प्रमुख स्रोत है। विशेषज्ञों के मुताबिक इन्हीं कारणों से एशिया को निकट भविष्य में आर्थिक संकट से राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।