दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का संघ आसियान एक बार फिर म्यांमार के मुद्दे पर गतिरोध दूर करने में नाकाम रहा है। गुरुवार को आसियान के विदेश मंत्रियों की हुई बैठक से यही संकेत मिला। आसियान ने म्यांमार के सैनिक शासन से इस बैठक में किसी गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि को भेजने का अनुरोध किया था। लेकिन म्यांमार के सैनिक तानाशाह जनरल मिन आंग हलायंग ने ये अनुरोध ठुकरा दिया।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि ये बैठक मूल रूप से 18 और 19 जनवरी को होने वाली थी। लेकिन म्यांमार के मुद्दे पर आसियान में मतभेद गहरा जाने के कारण वो बैठक टालनी पड़ी। तब कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने म्यांमार के सैनिक शासन के विदेश मंत्री वुना मुआंग ल्विन को आसियान बैठक के लिए आमंत्रित कर दिया था। लेकिन उसका मलयशिया, इंडोनेशिया, और सिंगापुर जैसे देशों ने कड़ा विरोध किया। ये देश ऐसे किसी कदम के खिलाफ हैं, जिससे सैनिक शासन को वैधता मिलने का संदेश जाए।
आसियान के कई सदस्य देशों के विरोध की वजह से इस बार हुई बैठक के लिए म्यांमार के गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि को बुलाने का फैसला हुआ। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने अपनी एक विशेष रिपोर्ट में बताया है कि सैनिक शासन ने आसियान के इस आमंत्रण को ठुकरा दिया। इस बारे में वुना मुआंग ल्विन ने जवाब भेजा, जिसमें कहा गया- ‘गैर राजनीतिक प्रतिनिधि भेजने से आसियान के समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत और व्यवहार का उल्लंघन होगा।’
हुन सेन ने जनवरी के पहले हफ्ते में म्यांमार की यात्रा की थी। वहां वे मिन आंग हलायंग से मिले थे। म्यांमार में एक फरवरी 2021 हुए सैनिक तख्ता पलट के बाद किसी देश के सरकार प्रमुख की यह पहली म्यांमार यात्रा थी। विश्लेषकों का कहना है कि 37 वर्षों से सत्तारूढ़ हुन सेन एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आसियान के कई सदस्य देशों को ये पहल मंजूर नहीं है। कुछ पर्यवेक्षक हुन सेन के इस रुख के पीछे चीन का हाथ देखते हैं। म्यांमार की तरह ही कंबोडिया के भी चीन के साथ निकट रिश्ते हैं।