फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खामोशी में डूबा चीन का शहर वुहान, जहां से हुई कोरोना वायरस की शुरुआत

विज्ञापन
चीन का वुहान शहर, जहां से कोरोना वायरस का संक्रमण पूरी दुनिया में पहुंचा है - फोटो : BBC
विज्ञापन

वुहान के बाहरी इलाके का एक गांव। घर के एक कमरे में एक बुजुर्ग महिला चुपचाप कुछ जाप कर रही हैं। दूसरी ओर, एक अन्य महिला सुबक रही हैं। इस साल फरवरी में कोरोना वायरस ने उनके 44 वर्षीय भाई की जान ले ली। ये महिला खुद को माफ नहीं कर पा रही हैं।

विज्ञापन


इस महिला का नाम मिस वॉन्ग और उनके भाई का नाम वॉन्ग फेई है। घर में सब उन्हें फेईफेई कहकर बुलाते थे। मिस वॉन्ग कहती हैं कि फेईफेई के अंतिम संस्कार के बाद उन्हें एक तांत्रिक के जरिए संदेश मिला, "फेईफेई को नहीं लगता कि उसकी मौत के लिए मैं जिम्मेदार हूं।" मिस वॉन्ग बताती हैं, "वो मुझे सहज कराने की कोशिश कर रहे थे और चाहते हैं कि मैं मान लूं वो अब इस दुनिया में नहीं है।"

उनके भाई ने कोविड वॉर्ड में दम तोड़ा जहां कोई उन्हें मिलने भी नहीं जा सकता था। आखिरी दिनों में उन्होंने बेबसी भरे कई संदेश भेजे।  ऐसे ही एक संदेश में उन्होंने लिखा, "मैं बहुत थका हुआ महसूस करता हूं, जैसे ये बीमारी बहुत लंबे समय से चली आ रही है।"
विज्ञापन


मिस वॉन्ग का जो अपराध-बोध है, वो इस वैश्विक महामारी के सबसे भयावह पहलुओं में से एक है, जहां कोरोना संक्रमित मरीजों को उनके परिवारों से एकदम अलग-थलग कर दिया जाता है। मिस वॉन्ग ने मुझे बताया, "मैं अपने भाई की देखभाल के लिए अस्पताल भी नहीं जा पाई। जब मैंने सुना कि उसने दम तोड़ दिया है, मुझे यकीन नहीं हुआ। मेरा परिवार टुकड़ों में बिखर गया है।"

वो ये जानना चाहती हैं कि उनके भाई का इलाज किस तरह किया गया, उनकी ठीक से देखभाल की गई थी या नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं कि अधिक प्रयासों से उसकी जान बचाई जा सकती थी? लेकिन पुलिस ने मिस वॉन्ग को विदेशी मीडिया के सामने मुंह ना खोलने की चेतावनी दी, जिसकी अनदेखी करना जोखिम-भरा है।

जिस एक महिला से हमने किसी तरह इंटरव्यू करने की कोशिश की, उसके साथ सादे कपड़ों में पुलिसवाले मौजूद थे। जब वो हमारी कार में दाखिल होने लगी, उन पुलिसवालों ने हमारा रास्ता रोक दिया। वुहान में दूसरे व्यक्ति से हम ईस्ट लेक के किनारे अंधेरे में मिले। उन्होंने हमें बताया कि पुलिस उनके पिता की मौत के बारे में बात करने के लिए दो बार घर आई थी। 

वुहान में महामारी कैसे और क्यों फैली, और क्या इसकी बेहतर तरीके से रोकथाम की जा सकती थी? पीड़ितों और पत्रकारों के लिए ये सवाल पूछना आसान नहीं है। लेकिन ये किसी की पसंद-नापसंद की बात नहीं है। वैश्विक महामारी के केंद्र वुहान के बारे में ये सवाल पूछना बेहद जरूरी है।

ये 15 जनवरी के आस-पास की बात है, जब वॉन्ग फेई को लगा कि उनकी तबीयत सही नहीं है। उस समय चीन में कोरोना वायरस की वजह से मरने वालों की आधिकारिक संख्या सिर्फ तीन थी। लेकिन अब दुनिया भर में एक करोड़ 29 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं। कम से कम साढ़े पांच लाख लोग दम तोड़ चुके हैं और वायरस की वजह से तमाम अर्थव्यवस्थाएं लॉकडाउन का दौर देख चुकी हैं।

वुहान ही वो जगह है जहां इस वायरस का पहली बार पता चला। यही वो जगह है जहां पहली बार इस वायरस पर काबू पाने की कोशिश हुई। यही वो जगह है जहां इस वायरस का स्रोत खोजा जाना चाहिए, ताकि सबसे बड़े अनुत्तरित सवाल का जबाव मिल सके, जिसकी वजह से अब चीन और अमरीका में प्रोपेगैंडा वॉर शुरू हो चुका है।

क्या कोरोना वायरस प्रकृति से निकला है, जैसा कि ज्यादातर वैज्ञानिक सोचते हैं, या कहीं ऐसा तो नहीं कि ये वायरस किसी प्रयोगशाला से लीक हुआ हो?

स वॉन्ग का कहना है कि उनका भाई ड्राइवर था और वुहान से शायद ही कभी बाहर गया था। उसके जीवन के 44 वर्षों के दौरान चीन का ये केंद्रीय शहर, पिछड़े औद्योगिक शहर से आगे बढ़कर इंटरनेशनल बिजनेस और ट्रांसपोर्ट का ठिकाना बन गया। लेकिन यदि वॉन्ग फेई के जीवन और वुहान में आए आमूलचूल बदलाव की तुलना की जाए तो उनके आखिरी दिन वैसे ही बीते, जिस तरह से ये शहर अपने उद्भव से आपदा तक पहुंचा।  

जनवरी की शुरुआत में ही डॉक्टरों को अहसास होने लगा था कि ये बीमारी बेहद संक्रामक है और उन्होंने अपने अस्पतालों में क्वांरटीन की प्रक्रिया आरंभ कर दी थी।

लेकिन तब अधिकारी, लोगों को अलर्ट करने के बजाए हेल्थ-वर्कर्स को ही चुप करा रहे थे। ली वेनलियांग नामक एक डॉक्टर ने जब अपने सहकर्मियों को संक्रमण के बारे में चेतावनी देने की कोशिश की, तब पुलिस ने उन्हें ऐसा करने से रोका और उनसे माफीनामा लिखवाया।

18 जनवरी के आसपास जब वॉन्ग फेई बीमार महसूस कर रहे थे, तब अधिकारी इस बात पर जोर दे रहे थे कि ये बीमारी संक्रामक नहीं है। वॉन्ग फेई अस्पताल गए जहां बुखार की वजह से उन्हें पैरासिटेमॉल देकर घर भेज दिया गया। वॉन्ग फेई ने अपनी बहन को बताया, "उन्होंने कहा है कि एक इंसान से दूसरे इंसान में संक्रमण नहीं हो रहा है, लेकिन सभी डॉक्टरों ने मास्क लगा रखे हैं।"

अधिकारियों ने तब जो भरोसा दिलाया था, मिस वॉन्ग को अभी भी शब्दश: याद है, जिसे वो दोहरा सकती हैं, "तब मैं उससे कह रही थी कि इसे काबू किया जा सकता है और फैलने से भी रोका जा सकता है।" वो कहती हैं, "लेकिन जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो मुझे एहसास होता है कि सरकार ने पर्याप्त चेतावनी नहीं दी थी। अब मैं ये जानती हूं कि तब उसे बाकायदा मेडिकल हेल्प की जरूरत थी। यही बात मुझे अपराध-बोध कराती है।"

वॉन्ग फेई को चीनी नव-वर्ष की छुट्टियों में जश्न मनाने के लिए परिवार की योजनाओं को रद्द करना पड़ा था। जश्न के बजाए उन्हें अपने दिन अस्पतालों के बाहर लगी कतारों में खड़े होकर बिताने पड़े। लेकिन बहुत अधिक मरीज और मरीजों के मुकाबले कम बेड होने की वजह से थक-हारकर वो अपने घर लौट आए थे। 

मिस वॉन्ग कहती हैं, "इस बात में उनका बड़ा गहरा भरोसा था कि देश और सरकार उन्हें प्यार करती है, जो उन्हें बचा लेगी।"

23 जनवरी को वुहान में लॉकडाउन की नौबत आ गई। तब ये दुनिया में अपनी तरह का पहला लॉकडाउन था, जहां वायरस को फैलने से रोकने के लिए कठोर पाबंदियां लंबे समय के लिए लगाई गईं। लेकिन रोकथाम के हिसाब से तब तक बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि लगभग 50 लाख लोग छुट्टियों मनाने के लिए वुहान से बाहर जा चुके थे। 

कुछ दिन बाद, वॉन्ग फेई की हालत बिगड़ने लगी और ऐंबुलेंस बुलाना पड़ा। परिवार के लोगों को बताया गया कि कतार में वॉन्ग फेई के आगे 600 से ज्यादा लोग पहले से मौजूद हैं। सात घंटे के इंतजार के बाद आखिरकार उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।

वॉन्ग फेई को तब अस्पताल में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अपनी बहन को भेजे संदेश में उन्होंने कहा कि अस्पताल में हालत ऐसी है कि उनकी देखभाल के लिए स्टाफ मिलना मुश्किल है, हालत ये है कि जरूरत पड़ने पर कोई पानी पिलाने वाला नहीं है। अस्पताल में उनकी हालत बिगड़ती चली गई। उसी अस्पताल में 7 फरवरी को डॉक्टर ली वेनलियांग ने दम तोड़ दिया। ये वही डॉक्टर थे जिन्होंने कोरोना वायरस के खतरे को सबसे पहले समझा था, लेकिन पुलिस ने उनका मुंह बंद करा दिया था। वॉन्ग फेई की उम्मीद टूट गई। उन्होंने अपनी बहन को संदेश भेजा, "यहां तक कि डॉक्टर की जान नहीं बची, मैं कैसे जिंदा बचूंगा?"  

डॉक्टर की मौत की बाद भी वुहान में अधिकारी बाकी डॉक्टरों को चुप करा रहे थे। एक अस्पताल के बाहर, हमारी बात एक नर्स से हुई, जिन्होंने कोविड-19 के मरीजों से जुड़े अपने अनुभव बताए। हमने एक-दूसरे से अपनी जानकारी साझा की जिसके बाद वो नर्स साइकल चलाती हुई हमसे दूर चली गईं। लेकिन बिना वर्दी के दो पुलिसवाले हम पर नजर रखे हुए थे। उन्होंने नर्स की साइकल को रोका।

मैं देख पा रहा था कि वो उस नर्स से कड़ाई से पूछताछ कर रहे थे। मेरे वहां पहुंचने से पहले उन्होंने नर्स को छोड़ दिया। कुछ देर बाद नर्स का फोन आया कि उस इंटरव्यू को डिलीट कर दो। नर्स की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

सूचनाओं पर नियंत्रण, चीन के सरकारी तंत्र का लंबे समय से एक अहम हिस्सा रहा है। हमारे इस मामले का सार भी यही निकलकर आया।

वुहान में जो लॉकडाउन किया गया, वो कोरोना पर काबू पाने के लिए लिहाज से सफल रहा। लेकिन चीन को आरोपों का सामना करना पड़ा जिनमें अमरीकी सरकार के आरोप भी शामिल थे कि चीन ने कोरोना से निपटने में देरी के साथ मामले की लीपापोती भी की, जिससे इस बीमारी ने वैश्विक संकट का रूप धारण कर लिया। जब भी कोई बीमारी फैलती है, शुरुआती दिनों में उठाए गए कदम बीमारी को बढ़ने से रोकने में कारगर साबित हो सकते हैं।

एक अध्ययन से ये संकेत मिलता है कि अगर एक हफ्ते पहले अधिकारी सही दिशा में हरकत में आए होते, तो चीन में संक्रमण के 66 प्रतिशत मामलों को कम किया जा सकता था। लेकिन अधिकारी इन आरोपों से इनकार करते हैं। उनका दावा है कि जिस बीमारी के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी, उससे निपटने के प्रयासों में उन्होंने जो फुर्ती दिखाई, उसकी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तारीफ की है।

चीन की सरकार अब अपनी तुलना पश्चिमी देशों से कर रही है, यहां तक कि उनका मजाक उड़ा रही है क्योंकि चीन को लगता है कि पश्चिमी देशों में बड़ी अव्यवस्था हुई और उन्हें समझ नहीं आया कि क्या करें। चीन उन लोगों को खामोश करा रहा है जो उसके इस दावे को चुनौती दे सकते हैं।

लोकतांत्रिक सरकारों की खामियां स्वतंत्र मीडिया उजागर कर रहा है, लेकिन चीन में ऐसी कोई छानबीन नहीं है। ये वो जगह है जहां कोई अपने मृत भाई के बारे में खुलेआम बात करने की कोशिश भी करे, तो पुलिस के कान खड़े हो जाते हैं।

हमने संसद के नुमाइंदों, वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों, अकादमिक दुनिया से जुड़े लोगों और डॉक्टरों समेत 20 से ज्यादा लोगों से इंटरव्यू के लिए अनुरोध किया। लेकिन हमारे किसी अनुरोध को मंजूरी नहीं मिली। हमने चीन के हेल्थ कमीशन, विदेश और विज्ञान मंत्रालयों को भी सवाल भेजकर संकट के शुरुआती दिनों की सामान्य जानकारी मांगी, लेकिन कहीं से कोई जबाव नहीं आया।

'स्पिलओवर थ्योरी'

फेई उस बड़े बाजार से ज्यादा दूर नहीं रहते थे जो कोरोना संक्रमण के शुरुआती दिनों में चर्चा का केंद्र बना हुआ था। इसका नाम है हुनान सी-फूड मार्केट जहां जायके के लिए जंगली जीव-जंतु खरीदे-बेचे जाते हैं। बाद में इसे बंद कर दिया गया।

शुरू में ये माना गया कि बीमारी की शुरुआत इसी बाजार से हुई जहां कोरोना वायरस जानवरों से इंसानों में पहुंच गया। कोरोना वायरस का नामकरण उसकी खास संरचना की वजह से हुआ है। चमगादड़ों ने इस वायरस के लिए वाहक की भमिका अदा की है।

चमगादड़ों से सीधे इंसान में या फिर किसी और जीव-जंतु को संक्रमित करने के बाद उसके जरिए ये वायरस इंसान तक पहुंच गया। ये एक थ्योरी है, जिसका आधार है चीन में नवंबर 2002 में हुआ संक्रमण। तब भी कोरोना परिवार से निकले वायरस ने लोगों को अपनी चपेट में लिया था।

सार्स कोरोना वायरस को अब सार्स कोव-1 के नाम से जाना गया, जिसके बारे में माना गया कि ये चमगादड़ से एक खास तरह की बिल्ली में होते हुए इंसानों तक पहुंचा। ये वही खास बिल्ली है जिसे दक्षिणी चीन के बाजारों में बेचा जाता है।

तब अधिकारी कई महीनों तक इस बीमारी को समझ ही नहीं पाए थे और सार्स दुनिया भर में 774 लोगों की जान ले चुका था।

लगभग दो दशक बाद सार्स कोव-2 समूह के वायरस का एक क्लस्टर वेंग फेई के शहर वुहान में नजर आया। एक अध्ययन में ये पाया गया कि इनमें से लगभग आधे वायरसों का सीधा संबंध उसी सी-फूड मार्केट से था जिसने दुनिया भर में चर्चा बटोरी।

इसमें तब हैरानी की कोई बात नहीं थी, जब बड़े पैमाने पर अटकलें लगाई गईं कि इस वायरस का जरिया बने किसी पशु-पक्षी को उसी बाजार में बेचा गया होगा।

लेकिन ऐसा लगता है कि उस बाजार में अलग-अलग जगहों से सैंपल लेकर उनकी जांच के बाद चीन ने इस थ्योरी को खारिज कर दिया है। वायरस के सुराग तो मिले, लेकिन जीव-जंतुओं के सैंपल में वायरस का पता नहीं चला। अधिकारी इस नतीजे पर पहुंचे कि बीमारी की शुरुआत कहीं और से हुई होगी और भीड़भाड़ भरे बाजार में बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल गई।

ज्यादातर वैज्ञानिक सहमत हुए कि बाजार से या कहीं और से सार्स-कोव2 वायरस स्वाभाविक तरीके से किसी पशु से एक इंसान में पहुंचा।

वैज्ञानिक इस बात की ओर इशारा करते हैं कि वायरस से संक्रमण के मामले बढ़ते गए, जिसमें इंसानों की विशाल आबादी और जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास में इंसानों के अतिक्रमण ने बड़ी भूमिका अदा की।

डॉक्टर युएन वॉक यंग, हॉन्ग कॉन्ग के एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं। वे चीन के नेशनल हेल्थ कमीशन के उस दल में शामिल थे जो तथ्यों का पता लगाने के लिए जनवरी में वुहान गया था। उनका कहना है कि वायरस की शुरुआत कैसे हुई, 'स्पिलओवर थ्योरी' इसका जवाब देती है। ऐसी घटनाएं इससे पहले भी हुई हैं जिनमें सार्स कोव-1 से लेकर एवियन-फ्लू जैसी महामारी शामिल हैं।

वो कहते हैं, "एच5एन1 पहली चेतावनी थी, फिर सार्स, उसके बाद एच7एन9 और अब सार्स-कोव2. इसलिए यदि आप मुझसे पूछेंगे कि सबसे अधिक संभावना क्या है तो मैं कहूंगा कि वायरस बाजार से आ रहे हैं, उस बाजार से जहां जंगली जीव-जंतु बेचे जाते हैं।"

वो कहते हैं कि इसीलिए रोकथाम के प्रयासों में जंगली पशु-पक्षियों के व्यापार पर फोकस रखना चाहिए। उनका मानना है, "कल्चर को बदलना आसान नहीं है, लेकिन हमें बदलना होगा।"

वायरस का सोर्स पता करना, सिर्फ अकादमिक रुचि का सवाल नहीं है। यदि सार्स-कोव-2 का संक्रमण जीव-जंतु की किसी खास प्रजाति से आया है, तब इसमें संदेह नहीं कि फिर कोई बीमारी फैलने का खतरा हो सकता है।

मई के महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंतरराष्ट्रीय प्रयास का आह्वान किया गया ताकि उस पशु या पक्षी का पता लगाया जा सके जिसके जरिए वायरस फैला हो। संगठन ने घोषणा की है कि उसे एक टीम चीन भेजने के लिए मंजूरी मिल गई है जो वहां जाकर इसकी पड़ताल करेगी। लेकिन वैज्ञानिकों को लगता है कि ये काम मुश्किल हो सकता है।

हमने चीन के नेशनल हेल्थ कमीशन, विदेश और विज्ञान मंत्रालयों को कई सवाल भेजकर ये जानना चाहा कि इस सिलसिले में अभी तक क्या काम हो चुका है। हमने जानना चाहा कि अलग-अलग प्रजाति के पशु-पक्षियों के टेस्ट के लिए क्यो कोई स्टडी शुरू हुई है, जिनसे हो सकता है कि कोरोना वायरस फैला हो। लेकिन हमें किसी सवाल का जबाव नहीं मिला। 

बंद हो चुके हुनान सी-फूड मार्केट के बाहर, हमें वीडियो बनाने से रोक दिया गया। एक पुलिसवाले से जब मैंने कहा कि मैं एक विदेशी पत्रकार हूं, उसने कहा, "मुझे कोई परवाह नहीं तुम कहां से आए हो। वायरस को रोकने के लिए चीन ने बहुत कुछ किया है। आपको सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देने की जरूरत है।"

वायरस की तलाश

वॉन्ग फेई जब अस्पताल में आखिरी सांसे गिन रहे थे, वुहान में ही एक अन्य जगह, जो हुनान सी-फूड मार्केट से 40 मिनिट की दूरी पर है, वहां एक और थ्योरी की वजह से सबकी निगाहें लगी हुई थीं। कॉन्सपिरेसी थ्योरी का तूफान खड़ा हो रहा था जिसके केंद्र में था वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी। संदेह हुआ और आरोप लगे कि कोरोना वायरस इसी लैब से लीक हुआ होगा।

ये आरोप और संदेह अभी तक बरकरार हैं। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी, पास की एक सड़क से नजर आता है जहां छोटी सी झील वाले एक कैंपस में कॉन्क्रीट और ग्लास का स्ट्रक्चर दिखाई देता है।

जैसे ही हम वहां पहुंचे, सिक्योरिटी गार्ड्स ने हमें फौरन घेर लिया। ये संवेदनशील इलाका है- ये कहते हुए उन्होंने पुलिस को बुला लिया। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोना वायरस के संग्रह और अध्ययन के मामले में दुनिया की अग्रणी लैब है।

यहां शोधकर्ताओं की कमान स्टार साइंटिस्ट शी झेंगली के हाथ में है जिन्हें उनकी विशेषज्ञता की वजह से उनके साथी 'बैट वूमन' कहते हैं। इन शोधकर्ताओं ने चीन में दूर-दराज की गुफाओं में रहने वाले चमगादड़ों के सैंपल जुटाने के लिए वर्षों काम किया है। 

एक हालिया शोधपत्र में चमगादड़ों में सैकड़ों कोरोना वायरस का ब्यौरा दिया गया है। प्रोफेसर शी इसकी सह-लेखक हैं। ऐसे कई शोध पत्र पहले प्रकाशित ही नहीं हुए जिनसे पता चलता कि कितने वायरस जुटाए गए थे।

शोध में कुछ वायरस में आनुवांशिक हेरफेर शामिल है, जिससे नए तरह के हायब्रिड वायरस बनाए गए ताकि इंसानों को संक्रमित करने की उनकी क्षमता का पता किया जा सके जो महामारी की वजह बनता है।

प्रोफेसर शी ने ही सार्स कोव-1 के नजदीकी ज्ञात वायरसों को खोजा और उनका जेनेटिक कोड भी तैयार किया। ये वायरस चीन के युन्नान प्रांत में गुफा में एक चमगादड़ में पाया गया था।

सार्स कोव-1 का संक्रमण फैलने के बाद इस बात का भय और खतरा काफी बढ़ गया था कि भविष्य में पहले से कहीं अधिक लोग संक्रमण का शिकार हो सकते हैं। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी इसी आशंका को ध्यान में रखकर शोध करता रहा है। 

किसी वायरस को यूं समझिए कि ये एक सुरक्षित परत में लिपटे हुए जेनेटिक मटेरियल हैं। किसी वायरस को अपने जैसे और वायरस बनाने के लिए जीवित वाहक की जरूरत होती है।
ये वायरस एक कोशिका से जुड़े हुते हैं और फिर परत पर मौजूद प्रोटीन के जरिए उस कोशिका को भेदते हैं। आकार में ये किसी मुकुट की तरह होते हैं जिससे उन्हें कोरोना वायरस नाम मिला।
कोशिका में प्रवेश करने के बाद ये वायरस उसकी आंतरिक व्यवस्था पर एक तरह से कब्जा जमा लेते हैं।    
दो जनवरी, जब ये पता चले सिर्फ तीन दिन ही हुए थे कि वुहान में एक नया वायरस फैल रहा है, प्रोफेसर शी ने सार्स-कोव-2 का सीक्वेंस भी तैयार कर लिया।

जिस तरह सार्स-कोव-2 का जेनिटिक कोड तैयार हुआ, खुद उससे इस थ्योरी को बल मिला कि वायरस लैब से लीक हुआ होगा। उसके बाद जो अध्ययन हुए, जिनमें प्रोफेसर शी का अध्ययन भी शामिल है, उनसे से संकेत मिलता है कि नए वायरस का जीनोम, पहले से ज्ञात उसी तरह के कोरोना वायरस के जीनोम से अलग है।

पता चला कि नया वायरस जिसकी संरचना क्राउन की तरह है, अपने वाहक की कोशिकाओं में घुस जाता है और ऐसा प्रतीत होता है कि मानव कोशिकाओं में बहुत अच्छी तरह से घुलमिल जाता है। ज्यादातर वायरस किसी नए वाहक से घुलने-मिलने में वक्त लगाते हैं, लेकिन सार्स-कोव-2 के मामले में प्रतीत होता है कि ये वायरस पहली बार सामने आने के बाद से ही बेहद संक्रामक रहा है।

एक शोध में इस नए संक्रमण की तुलना असल सार्स महामारी से की गई है। इसमें पाया गया है कि सार्स-कोव-2 पहले से ही ऐसा था जो इंसानों को आसानी से संक्रमित कर सकता है।

इस वायरस में एक और खासियत देखी गई जो सार्स-टाइप के कोरोना वायरस में नहीं थी। इसमें मानव कोशिका को भेदने की अधिक क्षमता थी। इसके बाद ये वायरस कोशिका को काबू में करके उसके भीतर अपनी संख्या बढ़ाता जाता है।

इन तमाम फैक्टर्स की वजह से वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी सवालों के घेरे में है। वहां जिस तरह का काम हो रहा था और वायरस की जो असामान्य प्रकृति है, सब मिलकर 'स्पिलओवर थ्योरी' का बेहद विवादित विकल्प देते हैं।

ये दावा कि वायरस एक लैब से लीक हुआ है, इसकी शुरुआत सबसे पहले फरवरी में चीन के इंटरनेट जगत से हुई थी।

ऐसी कई निराधार अफवाहें थी कि लैब में किसी संक्रमित जीव से इसका संक्रमण स्थानीय लोगों में हुआ होगा। या ये भी हो सकता है कि लैब में कोई शोधकर्ता किसी दुर्घटना की वजह से वायरस से संक्रमित हुआ हो। ये वो प्राकृतिक वायरस हो सकता है जिसे किसी जीव से निकाला गया हो, या फिर ये वायरस लैब में बना भी हो सकता है।

इसके बाद 'कॉन्सपिरेसी थ्योरी' को जैसे पंख लग गए। कई विदेशी अखबारों और वेबसाइट्स पर ये दावा किया गया कि ये वायरस किसी जैविक-हथियार की तरह बनाया गया होगा। लेकिन कोई भी थ्योरी, चाहे वो लैब से वायरस लीक होने की हो, मानव निर्मित वायरस की हो, जानबूझकर या दुर्घटनावश रिलीज होने की हो, उस पर यकीन करने का कोई ठोस सबूत नहीं है।

भारतीय शोधकर्ताओं का एक समूह उन पहले शोधकर्ताओं में शामिल है जिन्होंने वायरस के जीनोम का इस्तेमाल किया। इससे संकेत मिलता है कि लैब के अंदर वायरस में आनुवांशिक हेरफेर की संभावना है। लेकिन इस शोध को जल्द ही खारिज करके वापस ले लिया गया।

हालांकि ये वायरस कितना भी असामान्य लगे, लेकिन ये साबित करने के लिए कुछ भी नहीं है कि इस वायरस की जो खासियत हैं, वो सीधे प्रकृति से नहीं आ सकतीं।

फरवरी की शुरुआत में साइंटिस्ट शी झेंगली को मजबूर होकर खुद आगे आना पड़ा और सोशल मीडिया पर लोगों को जबाव देने पड़े। उन्होंने लिखा, "मैं शी झेंगली अपने जीवन की कसम खाकर कहती हूं कि इसका हमारी लैब से कोई लेना देना नहीं है।" उन्होंने ये भी लिखा कि जो लोग अफवाहें फैला रहे हैं, उन्हें 'अपना मुंह बंद' कर लेना चाहिए।

वुहान में वॉन्ग फेई की मौत कोरोना वायरस की ऐसी ही खासियतों की वजह से हुई थी जिस पर ये थ्योरी आधारित है। वायरस से संक्रमण के बाद इसी पैटर्न की वजह से किसी मरीज की हालत बिगड़ती जाती है और ये बात डॉक्टर समझ गए हैं।

बीमारी की वजह से वॉन्ग फेई के फेफड़ों को काफी नुकसान पहुंचा था। उनके रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही थी। वॉन्ग फेई ने अपनी बहन को संदेश भेजा, "मेरा हृदय 160 प्रति मिनट की दर से धड़क रहा है। रक्त में ऑक्सीजन का स्तर गिरकर 70 पर आ गया है। इससे मेरी जान निकल रही है।"

अगले दिन 8 फरवरी को वॉन्ग फेई ने अपनी बहन को आखिरी संदेश भेजा, "प्लीज मुझे बचा लो। मैं तारे देख सकता हूं।" इसके कुछ घंटों बाद वॉन्ग फेई ने दम तोड़ दिया।

वायरस से छेड़छाड़

अप्रैल की 30 तारीख को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले से जारी एक विवाद में कूद पड़े। एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा, "क्या आपने कुछ ऐसा देखा है जिससे आप पूरे भरोसे से कह सकें कि ये वायरस वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी से निकला है।?"

डोनाल्ड ट्रंप ने इसका जबाव दिया, "यस, आई हैव। यस आई हैव।" ट्रंप प्रशासन के अन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति की बात का समर्थन किया। विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने इस दावे के साथ चीन को कोसा कि "चीन में घटिया स्तर की प्रयोगशालाओं का इतिहास रहा है।"

लैब से वायरस लीक होने के दावे पर अमरीका कहता रहा कि इसकी पुष्टि के लिए कई सबूत हैं, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं दिया गया। इस थ्योरी के साथ ही अमरीका और चीन में विवाद तेज हो गया। राष्ट्रपति ट्रंप के आलोचकों को लगता है कि देश के भीतर कोरोना संक्रमण से निपटने के तौर-तरीकों की वजह से उनकी जो आलोचना हुई, उससे ध्यान हटाने के लिए ट्रंप ने चीन को निशाने पर लिया।

किसी साजिश की आशंका और प्रोपेगैंडा के बीच कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि लैब से वायरस लीक होने की संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये हमारे दौर की सबसे बड़ी वैज्ञानिक बहसों में से एक है जिसका असर ना केवल चीन बल्कि अमरीकी सरकार पर भी पड़ता है।

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी जिस तरह बड़ी संख्या में चमगादड़ों में मौजूद कोरोना वायरस को जमा करता है और उन पर प्रयोग करता है, ये कोई एक योजना नहीं है। ये उस प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रयास का एक हिस्सा रहा है जिसमें इंसानों पर नई महामारियों के बढ़ते खतरे पर चिंता जताकर उस पर फोकस किया गया।

वुहान के कुछ शोधकर्ताओं ने अमरीकी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम भी किया है और उन्हें अमरीका से बड़ी आर्थिक मदद भी मिली है। अलग-अलग वायरसों के जीनोम के कुछ हिस्से मिलाकर नया वायरस बनाने की आसान तकनीक दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में उपलब्ध है।

ऐसे शोध के फायदों और उसके जोखिम को लेकर वैज्ञानिकों में गहरे मतभेद रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि इससे अंदाजा लगाने में मदद मिलती है कि वायरस आखिर कैसे बनते हैं, इससे दवा और वैक्सीन बनाने में भी सहायता मिल सकती है।

लेकिन जो इसके खिलाफ हैं, उनका कहना है कि जोखिम की शक्ल में इसके नतीजे एकदम उलट भी हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि लैब में किसी वायरस के जीनोम में हेरफेर करके उसे ज्यादा घातक, ज्यादा संक्रामक बनाने से मनुष्य निर्मित महामारी की शुरुआत हो सकती है।

इसमें खतरा इस बात का है कि शोधकर्ता वायरस के सैंपल जुटाने और उन पर प्रयोग करने के क्रम में खुद भी संक्रमित हो सकते हैं और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता है। उदाहरण के लिए, जबसे सार्स कोव-1 कोरोना वायरस फैला, तबसे अब तक बीमारी का अध्ययन कर रही चार अलग-अलग प्रयोगशालाओं से वायरस लीक हो चुका है।

इनमें से दो घटनाएं साल 2004 में बीजिंग के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी में हुई थीं। उनमें से एक मामले में ऐसा हुआ कि लैब मे दो हफ्ते बिताने वाली एक रिसर्चर सार्स से संक्रमित हो गई। फिर उसने अपनी मां और एक नर्स को संक्रमित किया। इसके बाद मां की संक्रमण से मौत हो गई और नर्स ने कई अन्य लोगों को संक्रमित कर दिया।  

महामारी फैलाने वाले नए कोरोना वायरस की शुरुआत उसी शहर से हुई जहां इन विषाणुओं के अध्ययन के लिए खास तौर पर बनाई गई लैबोरेटरी थी। प्रोफेसर शी झेंगली ने इस संयोग को एक शुरुआत में स्वीकार कर लिया था।

प्रोफेसर शी झेंगली को पिछले साल दिसंबर में जब इस बीमारी का पता चला। उनका ध्यान लैब के फ्रीजर में रखे वायरसों की ओर गया। 'साइंटिफिक अमरीकन' को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वो ये सोच रही थीं कि कोरोना वायरस से यदि महामारी फैल सकती है तो "क्या ये वायरस हमारी लैब से निकल सकते हैं।"

लैब से वायरस लीक होने की थ्योरी पर ऑनलाइन और वॉशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में भले ही खूब चर्चा हुई हो, लेकिन वैज्ञानिकों का एक बड़ा हिस्सा इस थ्योरी को खारिज करता है। वैज्ञानिकों की ये आम सहमति मुख्यधारा के मीडिया कवरेज में दिखी। वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि सार्स-कोव-2 के मामले तेजी से बढ़ने की वजह प्राकृतिक है।

ये सिर्फ इस तथ्य पर आधारित नहीं है कि संक्रमण के इस तरह के मामले पहले भी हुए हैं, बल्कि प्रोफेसर शी झेंगली भी इसका प्रमाण देती हैं। 'साइंटिफिक अमरीकन' को दिए एक इंटरव्यू के मुताबिक, प्रोफेसर शी ने अपनी प्रयोगशाला में मौजूद सैंपल और उन पर किए गए प्रयोगों का रिकॉर्ड खंगाला।

फरवरी में पब्लिश हुए अपने एक पेपर में प्रोफेसर शी ने बताया था कि उन्होंने सार्स-कोव-2 से काफी मिलता जुलता वायरस निकाला है। इस वायरस को उन्होंने आरएटीजी 13 नाम दिया था, जिसे साल 2013 में एक चमगादड़ से निकाला गया था। ये वायरस सार्स-कोव 2 से 96.2 प्रतिशत समानता रखता है।

दो वायरस के बीच 3.8 प्रतिशत का जेनेटिक अंतर सुनने में भले ही करीबी मामला लगे, लेकिन अनुमानों के मुताबिक प्रकृति में इतने क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए कई दशकों का समय लग जाता है। सार्स-कोव-2 वायरस यदि किसी लैब से लीक हुआ होता तो इसके लिए जरूरी है कि उस लैब में सार्स-कोव-2 वायरस या उससे काफी मिलता जुलता वायरस मौजूद हो।

प्रोफेसर शी ने 'साइंटिफिक अमरीकन' से कहा, "इस बात से मेरे दिमाग पर मौजूद वजन उतर गया, मैं कई दिनों से सोई नहीं थी।" मार्च में 'नेचर मेडिसन' नाम के एक मेडिकल जर्नल में एक पेपर छपा। इसमें लैब से वायरस लीक होने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।

इस पेपर को एक प्रमाण के तौर पर स्वीकार किया गया कि ये वायरस लैब में नहीं बनाया गया है। इस शोध के लेखक ने तर्क दिया कि सार्स-कोव-2 में स्पाइक प्रोटीन और मानव कोशिका को भेदने की क्षमता वाली खासियत पक्के तौर पर प्रकृतिक रूप से आई होगी।

उनके प्रमाण कुछ हद तक संवेदनशील कम्प्यूटर मॉडलिंग के इस्तेमाल पर आधारित हैं। उनका तर्क है कि यदि किसी वैज्ञानिक ने ऐसे किसी मॉडल का इस्तेमाल ये जानने के लिए किया होता कि सार्स-कोव-2 कितना ताकतवर है और मानव कोशिका पर क्या असर डालता है तो नतीजों से कुछ और ही अनुमान निकलता।

दूसरे शब्दों में हम ये कह सकते हैं कि कोई कंप्यूटर वायरस की ताकत का अंदाजा नहीं लगा सकता, इसलिए शोधकर्ता का तर्क है कि कोई वैज्ञानिक इस वायरस को लैब में नहीं बना सकता।
विज्ञापन

दूसरी बात ये है कि सार्स-कोव-2 वायरस लैब में बनाने के लिए आपको अपने काम की शुरुआत उस वायरस से करनी होगी, जो आरएटीजी13 वायरस के जेनिटिक कोड से मिलता जुलता हो। ऐसे किसी वायरस से नया वायरस नहीं बनाया जा सकता जो मौजूद ही नहीं है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस बात की अधिक संभावना है कि इस वायरस ने इंसानों या जानवरों में पकड़ में आए बिना, लगातार फैलते हुए कई महीनों या वर्षों के दौरान, महामारी के लिहाज से खुद को इतना घातक बनाया होगा।

अमरीका के स्रक्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट में इम्युनोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर क्रिस्टियान एंडरसन का कहना है, "लैब से वायरस निकलने की संभावना पर हम बेहद सावधानी से विचार करते हैं और इस संभावना को खारिज नहीं करते।"

वो कहते हैं, "ये साफ है कि उपलब्ध तमाम आंकड़े सार्स-कोव-2 के इतिहास के अनुरूप हैं। वायरस का लैब से नाता बताने वाला कोई साइंटिफिक डेटा नहीं है।"

प्रोफेसर क्रिस्टियान एंडरसन आगे कहते हैं, लैब से वायरस का संबंध बताने वाली ज्यादातर बातें कांसपिरेसी थ्योरी हैं। इससे कोविड-19 को कंट्रोल करने के प्रयासों पर बुरा असर पड़ता है और इसकी वजह से लोग बेवजह परेशान होते हैं।

नेचर मेडिसिन पेपर के नतीजों पर व्यापक सहमति के बावजूद, कुछ वैज्ञानिक ऐसे हैं जो इसे निर्णायक सबूत के तौर पर देखने से मना कर देते हैं। वो ये मानने को तैयार नहीं कि वायरस में किसी तरह की आनुवांशिक हेरफेर नही की गई है।

एडिलेड की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी में मेडिसिन के प्रोफेसर और कोविड-19 की वैक्सीन बनाने की कोशिश कर रही ऑस्ट्रेलिया की एक कंपनी के रिसर्च डायरेक्टर निकोलाई पेट्रोवस्की का मानना है कि सार्स-कोव-2 की हैरान करने वाली क्षमता को देखते हुए प्रयोगशाला में किसी तरह की हेरा-फेरी की आशंका को दिमाग में रखना चाहिए।

निकोलाई पूर्व नियोजित कम्प्यूटर मॉडल के तर्क को खारिज करते हैं। वो कहते हैं, "विज्ञान में बहुत सारी चीजें आजमाइश के आधार पर और बहुत कुछ अनायास हो जाता है। अनायास कुछ खोज हो जाने से कई वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार जीत पाएं हैं।"

अन्य शोधकर्ता वुहान में अतीत में हुए प्रयोगों का जिक्र करते हैं जब अलग-अलग वायरसों के जीनोम मिलाकर ये पड़ताल की गई कि स्पाइक प्रोटीन कैसे मानव कोशिकाओं को प्रभावित करता है।

शोधकर्ता इस ओर भी इशारा करते हैं कि वुहान की लैब में जो सैकड़ों कोरोना वायरस इकट्ठा किए गए थे, उनमें से किसी की जेनेटिक संरचना आरएटीजी13 के मुकाबले सार्स-कोव-2 से मिलती-जुलती थी या नहीं, ये जानने का कोई तरीका नहीं है।

इतना ही नहीं, आरएटीजी13 भी कुछ अटकलों का विषय रहा है। एक प्रतिष्ठित चाइनीज डेटाबेस चलाने वाले शोधकर्ताओं ने बीबीसी को इस बात की पुष्टि की है कि ये वही वायरस है जिसे वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी ने एक पेपर में आरएबैटकोव/4991 बताया था।

नाम क्यों बदला गया, इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं है, लेकिन साल 2016 के उस पेपर में साफ कहा गया था कि ये वायरस सार्स-टाइप कोरोना वायरस की कड़ी में नया है।

प्रोफेसर पेट्रोवस्की का कहना है कि ये अजीब होगा यदि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी इस तरह के वायरसों में रुचि रखने के बावजूद इस पर काम जारी नहीं रखे। लेकिन इस साल से पहले तक इसका कहीं जिक्र नहीं हुआ था, जब आरएबैटकोव/4991 एक नए नाम आरएटीजी13 के रूप में दोबारा सामने आया। आरएटीजी13 वही है जिसका सार्स-कोव-2 से करीबी संबंध पाया गया।

अमरीका की रटगर्स यूनिवर्सिटी में माइक्रोबायोलॉजिस्ट और बायोसेफ्टी एक्सपर्ट प्रोफेसर रिचर्ड ब्राइट का कहना है कि लैब से लीक की बात को अंतिर रूप से खारिज करने का केवल एक ही रास्ता है। वो कहते हैं, "एक विश्वसनीय जांच पड़ताल के लिए जांचकर्ताओं को लैब, सैंपल और रिकॉर्ड्स तक बेरोकटोक रास्ता मिले।"

अमरीकी सरकार ने अप्रैल में एक बयान में कहा था कि "इंटेलीजेंस बिरादरी को नहीं लगता कि इस वायरस को बनाया गया होगा या उसमें किसी तरह के बदलाव किए गए होंगे, लेकिन सरकार सूचनाओं और इंटेलीजेंस को परखती रहेंगी ताकि तय किया जा सके कि महामारी संक्रमित पशु के संपर्क में आने से शुरू हुई या ये वुहान की लैब में किसी चूक का नतीजा है।"

हमने अपना आग्रह प्रोफेसर शी झेंगली तक पहुंचाया कि हम उनसे बात करना चाहते हैं। लेकिन आग्रह को ठुकरा दिया गया। हमने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी को सवाल भेजे, ये जानने के लिए कि क्या कोई जांच-पड़ताल की गई है, यदि नहीं तो क्या वो जांच की अनुमति देने के इच्छुक हैं। लेकिन कोई जबाव नहीं मिला।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें