साल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने से ठीक पहले जब अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया तो इस एक घटना ने दुनिया की राजनीति में सब कुछ बदल दिया। ये एक नये युग की शुरुआत थी।
एक ऐसा युग जब दुनिया ने पारंपरिक युद्ध की जगह एक विध्वंसकारी युद्ध के साये में जीना शुरू कर दिया। अमेरिकी सरकार के इस कदम के बाद रूस ने भी परमाणु हथियारों का विकास करना शुरू कर दिया। इसके बाद कई सालों तक अमेरिका और रूस में परमाणु हथियारों की एक ऐसी होड़ लगी रही जिसमें दोनों देश एक दूसरे को पीछे छोड़ने की कोशिश में लगे हुए थे।
इसी बीच दुनिया ने क्यूबा मिसाइल संकट भी देखा जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु युद्ध शुरू होने जैसी स्थिति बन गई थी। इस दौर में हमले की चेतावनी मिलते ही आपको और आपके परिवार को तत्काल किसी जगह छिपना होता था।
लेकिन आखिरकार सोवियत संघ और अमेरिका इस तरह के संघर्ष से बचने के लिए कुछ नियम और शर्तें मानने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन और सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्वाचोव ने साल 1987 में इंटरमीडिएट रेंज न्युक्लियर फोर्सेज़ ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए।
ये एक ऐतिहासिक घटना थी क्योंकि एक लंबे अरसे तक अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध चलने के बाद दुनिया के ये दो सबसे शक्तिशाली देश इस मुद्दे पर एक समझौता कर पाए थे। इस संधि ने प्रतिबंधित परमाणु हथियारों और ग़ैर-परमाणु मिसाइलों की लॉन्चिंग को रोकने की दिशा में काम किया।
लेकिन ट्रंप को ये संधि पसंद नहीं
अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल ही में ऐलान किया है कि वह अपने देश को इस संधि से बाहर निकाल रहे हैं। डोनल्ड ट्रंप कहते हैं, "दुर्भाग्य के साथ ये कहना पड़ रहा है कि रूस ने इस संधि का सम्मान नहीं किया है। ऐसे में हम इस संधि को तोड़ने जा रहे हैं। हम इस संधि से बाहर निकल रहे हैं।"
अमेरिकी सरकार के इस कदम के बाद सवाल उठता है कि क्या हमें एक परमाणु युद्ध की आशंका से डरना चाहिए या दुनिया को ऐसी संधियों की ज़रूरत है। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें ये समझना होगा कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच जो संधि हुई थी उसका हमारी दुनिया पर क्या असर पड़ा।