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'यहूदी या ईसाई मस्जिद में वोट क्यों नहीं डाल सकते?'

Fri, 28 Oct 2016 12:33 PM IST
इरम अब्बासी/ बीबीसी  संवाददाता,
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- फोटो : BBC
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अमेरिका में नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में एक मस्जिद को मतदान केंद्र बनाने का फैसला वापस लिए जाने का मुस्लिम समुदाय विरोध कर रहा है। चुनाव के लिहाज से अहम राज्य फ्लोरिडा के पाम बीच काउंटी में एक इस्लामिक सेंटर है। इसका मस्जिद के अलावा कई अन्य कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पाम बीच काउंटी चुनाव प्रशासन ने कुछ महीने पहले मस्जिद प्रशासन को एक अधिसूचना जारी कर मस्जिद को मतदान केंद्र बनाने का अनुरोध किया था। प्रशासन ने गैर मुस्लिम तबकों से शिकायतों के बाद मस्जिद को मतदान केंद्र बनाने का फैसला वापस लिया था। लेकिन धार्मिक सद्भाव के लिए अलग-अलग धर्मों के नेताओं के गठबंधन 'इंटर फेथ कलरजी कोइलेशन' ने भी प्रशासन के इस फैसले की निंदा की है।
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इस निंदा के बावजूद प्रशासन ने फैसला वापस लेने से इनकार कर दिया है। इस्लामिक सेंटर का निर्माण साल 2000 में हुआ था। इसका इस्तेमाल बतौर स्कूल और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी किया जाता है। फ्लोरिडा अटलांटिक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और इस्लामिक सेंटर के संस्थापक बासिम अलहलाबी ने बीबीसी उर्दू से बात करते हुए बताया, "प्रशासन की ओर से अधिकारी मस्जिद में आए थे। उन्होने तय किया कि इस्लामिक सेंटर के रिसेप्शन में मतदान केंद्र बनाए जाएंगे।"
 

यहूदी या ईसाई मस्जिद में आकर वोट क्यों नहीं डाल सकते?"

- फोटो : BBC
बासिम अलहलाबी ने बताया कि इसके बाद हमने तुरंत मतदाताओं के खाने-पीने के बंदोबस्त को लेकर तैयारियां शुरू कर दी। लेकिन इसके बाद कुछ गैर मुस्लिम मतदाताओं ने प्रशासन को फोन करके शिकायत की कि वे लोग मस्जिद के अंदर जाने से डरते हैं। कुछ ने तो मतदान रोकने की धमकी भी दे डाली। इसके बाद ही प्रशासन ने फैसला वापस ले लिया। वे अफसोस जाहिर करते हुए पूछते हैं, "अगर मुसलमान चर्च में जाकर वोट डाल सकते हैं तो यहूदी या ईसाई मस्जिद में आकर वोट क्यों नहीं डाल सकते?"

फ्लोरिडा में धार्मिक सद्भाव के लिए काम कर रहे संगठन 'इंटर फेथ कलरजी कोइलेशन' के अध्यक्ष डेविड स्टेन हार्ट प्रशासन के इस फैसले की निंदा करते हैं। बीबीसी से उन्होंने कहा, "यह इस्लाम के खिलाफ भेदभाव और इसके प्रति डर की भावना ही लगती है कि हम इस चुनाव में ऐसी बातें सुन रहे हैं और अपने-अपने समुदाय के धार्मिक नेता होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम धार्मिक सद्भाव की बात करने वाली आवाजों को दबने न दें। ताकि नफरत की हार हो।"
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"हां मगर यह उनकी अस्थायी जीत है,

- फोटो : BBC
इस सवाल पर कि इस मामले में जीत तो नफरत की ही हुई है? उन्होंने कहा, "हां मगर यह उनकी अस्थायी जीत है, आखिरकार जीत तो हमारी ही होगी।" फ्लोरिडा में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी भी इस फैसले के भुक्तभोगी हैं।

सादिया रहमान बताती हैं, "मैं अमरीका में पली हूं। मेरे माता पिता के पाकिस्तान से संबंध होना या हमारा मुसलमान होना हमारे अमरीकी पहचान के मूल्य को कम नहीं करता। मुझे दुख है कि पूर्वाग्रह की जीत हुई है। "

यहां की एक और रहवासी ऐनी हयात का कहना है, "कुछ खास तरह के समूह हैं जो मस्जिद, मुस्लिम या हिजाब नहीं देखना चाहते। जब पाकिस्तान जाती हूं तो वे मुझे मेरा घर नहीं लगता क्योंकि मैं वहां कभी अधिक समय नहीं रही।

वहां मेरे रिश्तेदार मेरे उर्दू उच्चारण का मजाक उड़ाते हैं लेकिन जब अमेरिका में भी लोग भेदभाव करते हैं तो मुझे लगता है कि मेरा इस दुनिया में कोई घर है ही नहीं।" जानकारों का कहना है कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में धर्म के नाम पर भेदभाव या पूर्वाग्रह साफ तौर पर उजागर हुए हैं। इससे अमेरिकी समाज के दो हिस्सों में बंटने की चिंता बढ गई है।
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