पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का रवैया नरम रहा है और वह इसे आर्थिक मदद भी देता रहा है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के हालिया ट्वीट के बाद हालात बदलते दिख रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि बीते वर्षों में पाकिस्तान को अरबों डॉलर की मदद देना बेवकूफी थी और इसके बदले में उन्हें पाकिस्तान की तरफ से धोखे के सिवाय कुछ नहीं मिला।
इसके बाद अंतत: पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोक दी गई है। लेकिन ऐसा क्यों है कि कभी पाकिस्तान को भारी भरकम आर्थिक मदद देने वाला अमेरिका, अचानक उससे इतनी बेरुखी दिखा रहा है?
इस बारे में बीबीसी ने पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों पर नजर रखने वाले अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डेनियल मार्की से बात की। मार्की ने 'नो एग्जिट फ्रॉम पाकिस्तान' नाम की किताब भी लिखी है। मार्की कहते हैं कि ट्रंप के हालिया बयानों से ऐसा लगता है कि पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का रवैया अब ज्यादा सख़्त हो रहा है।
उन्होंने कहा, "इससे पहले के राष्ट्रपतियों जैसे ओबामा और बुश को लगता था कि पाकिस्तान को फंडिंग देने से फायदा होगा लेकिन अब पाकिस्तान को पुचकारने के बजाय डंडा दिखाया जाने लगा है।"
अमेरिका अब पाकिस्तान को दी जाने वाले साढ़े पच्चीस करोड़ डॉलर की सैनिक मदद रोक रहा है जो फैसला अब तक टलता आ रहा था। अमेरिका पाकिस्तान को ये राशि हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई करने की शर्त पर दे रहा था लेकिन इसका कोई ख़ास असर दिख नहीं रहा था।
मार्की का अनुमान है कि आने वाले वक्त में अमेरिका के फैसलों में और सख्ती आ सकती है। मसलन आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) जैसे संगठनों से अंतरराष्ट्रीय कर्ज के लिए समर्थन देने से पीछे हट सकता है। प्रोफेसर मार्की मानते हैं कि बेशक़ अमेरिका को भी पाकिस्तान की जरूरत है क्योंकि अफगानिस्तान में उसके सैनिक हैं और उनके आने-जाने के लिए दुनिया के नक्शे पर ज्यादा रास्ते नहीं बचे हैं।
ईरान बंद है और मध्य एशिया में रूस के साथ भी अमेरिका के सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं। ऐसे में पाकिस्तान से होकर जाना ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने कहा, "अमेरिका के लिए पाकिस्तान के अपने फायदे हैं। दूसरी बात ये कि पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है। ऐसा भी नहीं है कि पाकिस्तान एकदम अकेला है। चीन उसका पुराना साथी है जो उसे अरबों डॉलर की मदद देता आ रहा है।"