बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ का कहना है कि दुनियां भर में तक़रीबन 23 करोड़ ऐसे बच्चे हैं जिनके जन्म का कभी पंजीकरण ही नहीं हुआ है।
यूनिसेफ़ का कहना है कि इस आंकड़े का मतलब है कि दुनियां भर में तीन में से एक बच्चे का पंजीकरण नहीं हुआ है और इसका घाटा इन्हें इस तरह से उठाना होगा कि ये शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की बहुत सारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाएंगे।
यूनिसेफ़ ने पिछले साल कहा था कि दुनियां भर में सिर्फ़ 60 फ़ीसद बच्चे ऐसे हैं जिनका पंजीकरण जन्म के वक्त हो पाता है।संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने ये शोध 161 मुल्कों में किया था। बुधवार को यूनिसेफ़ की स्थापना का 67वां दिवस है।
सबसे कम
संस्था का कहना है कि पंजीकरण की दर दक्षिण एशिया और अफ़ीका के सहारा क्षेत्र के मुल्कों में सबसे कम है।
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यूनिसेफ़ की डिप्टी डायरेक्टर गीता राव गुप्ता का कहना है कि पंजीकरण न सिर्फ बच्चों की मौजूदगी और शख्सियत की स्वीकृति है बल्कि ये इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि ये सुनिश्चित करता है कि "उन बच्चों के भुला नहीं दिया जाएगा और उन्हें मूल्कों की तरक्की में हिस्सेदारी मिलेगी।"
गीता राव का कहना था कि बच्चों की गिनती नहीं होने का असर समुदायों और देशों की तरक्क़ी पर भी पड़ेगा।
रूकावटों की वजह
यूनिसेफ़ का कहना है पंजीकरण न होने की कई वजहे हैं जिसमें मां-बाप के पास इस बात की पूरी जानकारी शामिल न होना और सांस्कृतिक रूकावटें हैं।
संस्था का कहना है कि कई बार लोगों को इस बात का भी डर होता है कि जानकारी का इस्तेमाल जातीय, धार्मिक और उस तरह के बच्चों का पता लगाने के लिए जो विवाहेतर संबंधों से पैदा हुए हों।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्सर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले, ग़रीब परिवार के बच्चों का पंजीकरण नहीं होता है। साथ ही कई बार इसके लिए कई जगहों पर ली जाने वाली अधिक फीस भी एक वजह हो सकती है।
दस उन मुल्कों में जहां जन्म का पंजीकरण सबसे कम होता है में सोमालिया, लाईबेरिया, इथोयपिया, ज़ांबिया, चाद, तंज़ानिया, यमन, पाकिस्तान और कांगों शामिल हैं।