अमेरिका ने उम्मीद जताई है कि शायद भारत हामिद करजई को उस समझौते पर दस्तखत करने के लिए राज़ी कर ले जिसकी बदौलत अमेरिकी फौज 2014 के बाद भी अफगानिस्तान में मौजूद रह सकेगी।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए अमेरिका के ख़ास दूत जेम्स डॉबिंस ने कहा है कि इस दोतरफ़ा सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने में जितनी देर हो रही है उससे अफगानिस्तान का भारी नुकसान हो रहा है।
अमेरिकी कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति के सवालों का जवाब देते हुए जेम्स डॉबिंस ने उम्मीद जताई कि संभव है कि साल के अंत से पहले करजई इस पर दस्तखत कर दें लेकिन इसमें जितनी देर होगी उससे लोगों की चिंताएं बढ़ेंगी।
दस्तखत करने के लिए प्रोत्साहित
उनका कहना था कि ईरान के अलावा क्षेत्र के सभी देश—भारत, पाकिस्तान, रूस और चीन ने करजई को इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए प्रोत्साहित किया है।
उनका कहना था, “उनका आगामी भारत दौरा काफ़ी असरदायक हो सकता है क्योंकि वो भारत की इज्जत भी करते हैं और भारत सरकार के साथ उनके काफ़ी अच्छे संबंध हैं।”
डॉबिंस का कहना था ऐसा नहीं है कि इलाके के सभी देश अफगानिस्तान में हमेशा के लिए अमेरिकी फ़ौज की मौजूदगी के बहुत बड़े समर्थक हों लेकिन वो जानते हैं कि अगर अभी वहां से अंतरराष्ट्रीय सेना हट गई तो वहां गृहयुद्ध की नौबत आ सकती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में फिर से चरमपंथियों का राज हो जाएगा, अफ़गान नागरिक शरणार्थी बनकर पड़ोस के देशों में भागेंगे, व्यापार ठप्प हो जाएगा और इन सबका मिला-जुला असर पूरे क्षेत्र पर होगा।
भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निमाण में दो अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है और अफगानिस्तान में अमेरिकी फ़ौज की मौजूदगी का समर्थक है।
जिरगा की मंज़ूरी भी
डॉबिंस का कहना है कि अगर अमेरिकी फ़ौज पूरी तरह से अफगानिस्तान से निकल गई तो क्षेत्र के सभी देश अपने फ़ायदे के हिसाब से फ़ैसला करेंगे और वो बहुत अच्छी स्थिति नहीं रहेगी।
अमेरिका और अफगानिस्तान के बीच इस समझौते के दस्तावेज पर करजई तैयार हो चुके थे और फिर इसे अफगानिस्तान के महापंचायत या लोया जिरगा की मंज़ूरी भी मिल गई।
लेकिन राष्ट्रपति करजई ने अब उसमें दो और नई शर्तें जोड़ दी हैं और कहा है कि अगले अप्रैल में होनेवाले चुनावों से पहले वो इसपर दस्तखत नहीं करेंगे।
करजई के फ़ैसले ने अमेरिका में काफ़ी नाराज़गी पैदा की है और अमेरिकी कांग्रेस का कहना है कि वो अमेरिका के “सब्र की परीक्षा” ले रहे हैं।
अमेरिकी मीडिया और कांग्रेस में भी आवाज़ें उठ रही हैं कि अमेरिका ज़ीरो ऑप्शन यानि 2014 के दिसंबर के बाद एक भी फौजी अफगानिस्तान में नहीं रखने पर गंभीरता से सोचना शुरू कर दे।
लेकिन जेम्स डॉबिंस और ओबामा प्रशासन के दूसरे अधिकारियों का भी कहना है कि ऐसा करना आत्मघाती होगा और जो अब तक हासिल हो पाया है सब बर्बाद हो जाएगा।
करजई की शर्त
डॉबिंस का कहना था, “अगर अमेरिकी फ़ौज पूरी तरह से वापस हो जाती है तो आम अफ़गान नागिरक पर असर तो होगा ही, सबसे ज़्यादा बुरा असर होगा औरतों की ज़िंदगी पर।”
उनका कहना था कि अभी जो अनिश्चितता का माहौल है उस वजह से मकानों की कीमत गिरने लगी है और निवेशक अपना पैसा बाहर खीच रहे हैं।
करजई की पहली शर्त है कि अमेरिका तालिबान के साथ बातचीत की प्रक्रिया की शुरूआत करा दे और दूसरी शर्त ये कि अमेरिकी फ़ौज किसी हाल में अफ़गान नागरिकों के घर में नहीं प्रवेश करेगी।
इस समझौते के तहत अंदाजा है कि अमेरिका 10 से 15 हजार फौज अफगानिस्तान में छोड़ देगा जो मुख्य रूप से आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में अफ़गान सुरक्षा बलों की मदद करेंगे।
अमेरिकी अधिकारियो का कहना है कि अगर ये समझौता नहीं हुआ तो अमेरिकी कांग्रेस से अफगानिस्तान के लिए जो मदद की राशि मिलती है उसमें भी रूकावट पैदा हो सकती है।