न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस/वाशिंगटन। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी वादे के तहत जलवायु परिवर्तन संबंधी नए कार्यकारी आदेश पर दस्तखत करते हुए उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा की नीतियों को खत्म कर दिया। ओबामा ने अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाकर गर्म होती धरती पर जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए कई उद्योगों पर प्रतिबंध लगाए थे। आदेश पर दस्तखत करने के बाद ट्रंप ने कहा कि अब कोयला विरोधी और नौकरियां खत्म करने वाली नीतियां खत्म होंगी। इससे उद्योगों में उत्साह है, जबकि पर्यावरणविदों ने इसकी निंदा की है।
ट्रंप ने साफ किया कि अमेरिका का इरादा ऐसे काम करने का नहीं था जो उनके पूर्ववर्ती ने कार्बन डाय-ऑक्साइड के प्रदूषण से गर्म होती धरती को नियंत्रित करने के लिए जलवायु परिवर्तन की राष्ट्रीय नीति बनाकर किया था। नए आदेश के तहत ओबामा के कार्यकाल में लागू हुई करीब आधा दर्जन नीतियां रद कर दी गई हैं। इससे जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन मिलेगा। उद्योग जगत ने ट्रंप के इस आदेश को सराहा है, जबकि पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों ने इसकी निंदा की है। पर्यावरण से जुड़े अरबपति कार्यकर्ता टॉम स्टेयर ने इस फैसले को मूल्यों का अपमान बताया है। कुछ एजेंसियां इस आदेश को कोर्ट में चुनौती देने की तैयारियां भी कर रही हैं।
ट्रंप ने पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के भवन में इस आदेश पर मुहर लगाई और कहा कि - ‘सरकार कोयले पर जारी संघर्ष को खत्म करते हुए मैं अमेरिकी ऊर्जा पर लगे प्रतिबंधों, सरकारी रोक-टोक और नौकरियां के अवसर खत्म करने वाली नीतियों के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठा रहा हूं।’ ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान अमेरिकियों से वादा किया था कि वे 2015 में हुए जलवायु परिवर्तन समझौते से देश को अलग कर देंगे। नए आदेश में ओबामा की स्वच्छ ऊर्जा योजना को भी रद कर दिया गया है, जिसमें पेरिस समझौते के तहत अमरीका के सभी प्रांतों में कार्बन उत्सर्जन की सीमा को घटाना था।
भारत, चीन व ब्राजील पर लगी हैं कई नजरें
ट्रंप के इस कार्यकारी आदेश का असर पूरी दुनिया पर पड़ना निश्चित है। अमेरिका विश्व का दूसरा सर्वाधिक जलवायु प्रदूषण पैदा करने वाला देश है, जिसके बाहर होने के बाद खालीपन को भरने के लिए कई देशों के कूटनीतिक विशेषज्ञ तिकड़म लगाना शुरू कर दिए हैं। हार्वर्ड में पर्यावरण अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रॉबर्ट स्टेविंस ने कहा कि ट्रंप के फैसले के बाद दुनिया की निगाहें अब भारत, ब्राजील और चीन पर टिक गई हैं, क्योंकि यदि इन देशों ने भी पुराने रवैये को अपनाया तो धरती का तापमान कम रखने की कोशिशें खत्म हो सकती हैं। 2015 के पेरिस समझौते की प्रमुख वार्ताकार लॉरेंस ट्युबियाना ने कहा कि दुनिया के कई देश ट्रंप के आदेश का फायदा उठाना चाहेंगे और जलवायु पर किए उनके वादे तोड़ सकते हैं।
क्या है पेरिस समझौता
धरती को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाने और ग्लोबल तापमान दो डिग्री सेंटीग्रेड तक नीचे लाने के लिए यह समझौता किया गया था। इसके तहत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए पेरिस में 197 देशों ने जलवायु परिवर्तन समझौते को स्वीकार किया था। इसके तहत जलवायु परिवर्तन से निपटने में विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की मदद के लिए साल 2020 से 100 अरब डॉलर हर साल देने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। कई विकासशील देश इस समझौते को अपने खिलाफ भी मानते हैं।