फेसबुक और गूगल आम आदमी के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं, हालात यह हैं कि लोगों को इनकी लत लगती जा रही है, जिससे उनकी जीवनशैली पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। अनिद्रा और डिप्रेशन के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
ऐसे में
फेसबुक और
गूगल के पूर्व कर्मचारियों ने टेक्नोलॉजी की लत से छुटकारा दिलाने के लिए कैंपेन लॉन्च किया है। इस कैंपेन में इस बात को हाईलाइट किया गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया युवाओं को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस कैंपेन के जरिये टेक कंपनियों पर दवाब बनाये जाने की कोशिश की जायेगी कि वो ऐसे प्रोडक्ट्स बनाएं जिसकी लोगों को लत न लगे।
गूगल में काम कर चुके ट्रिस्टन हरीस और पूर्व फेसबुक इनवेस्टर और एडवाइजर रोगर मैकनेमी ने ये मुद्दा उठाया है। रोगर ने कहा कि वह मार्क जुकरबर्ग के मेंटर थे लेकिन आज वह उनसे कहना चाहते हैं कि आपके यूजर्स खतरे में हैं।
वहीं इस मुद्दे पर कॉमन सेन्स के सीईओ जेम्स स्टेयर ने कहा कि टेक कंपनियां बड़े पैमाने पर हमारे बच्चों पर असर डाल रही हैं लेकिन कोई भी ऐसा नहीं है जो इन कंपनियों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास करवा सके।
टेक कंपनियां बच्चों की भावनाओं और उनके विकास को प्रभावित कर रही हैं। अगर बच्चों के माता-पिता को यह बात पता लगेगी कि टेक कंपनियां किस तरह उनके बच्चों का प्रयोग कर सकती हैं तो यकीकन बच्चों के मां-बाप कहेंगे कि इस इंडस्ट्री में परिवर्तन होना चाहिए।
कॉमन सेन्स की रिसर्च के मुताबिक युवा अपने दिन के 9 घंटे सोशल मीडिया को देते हैं। 56 फीसदी से ज्यादा लोग डिजिटल मीडिया का प्रयोग करते हैं, जिनमें से ज्यादातर लोगों ने कहा कि वह खुश नहीं हैं और डिप्रेशन में हैं। जनवरी में सेल्सफोर्स के सीईओ मार्क बेनिऑफ ने भी कहा था फेसबुक को सिगरेट इंडस्ट्री की तरह ही माना जाना चाहिए।