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भारत में आजादी के बाद भी गुलाम हैं 1.84 करोड़ लोग, दुनिया भर में इनकी संख्या चार करोड़: रिपोर्ट

Thu, 19 Jul 2018 06:09 PM IST
एजेंसी, न्यूयॉर्क 
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- फोटो : social media
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भारत को आजाद हुए सात दशक बीत गए हैं लेकिन आज भी देश की 1.3 अरब जनसंख्या में कुल 1.84 करोड़ लोग गुलाम हैं। यह आंकड़े हैं वर्ष 2016 के जिन्हें मानवाधिकार समूह वाक फ्री फाउंडेशन ने ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स-2018 नामक रिपोर्ट में बृहस्पतिवार को प्रकाशित किया है। 

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वाक फ्री फाउंडेशन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक 2016 तक दुनिया भर में चार करोड़ से अधिक लोग गुलाम हैं। भारत इनमें शीर्ष पर है, जबकि उत्तर कोरिया में हर 10 में से एक इंसान आधुनिक युग का गुलाम है।

सबसे ज्यादा गुलामों वाले शीर्ष पांच देशों में भारत के बाद चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और उजबेकिस्तान शामिल हैं। फाउंडेशन ने पूर्व में कहा था कि शीर्ष पांच देशों के भीतर दुनिया के कुल 58 फीसदी लोग गुलामी के वातावरण में अपना जीवन बिता रहे हैं। 
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इंडेक्स के मुताबिक उत्तर कोरिया, अफ्रीकी देश इरिट्रिया और बुरुंडी में वहां की जनसंख्या की दर के हिसाब से गुलाम लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। चूंकि भारत की आबादी के मुकाबले उत्तर कोरिया, इरिट्रिया व बुरुंडी की आबादी बेहद कम है इसलिए यहां आनुपातिक रूप से गुलामी का प्रतिशत भी भारत से काफी ज्यादा है। 

आंकड़े एकत्रित करने वाली टीम के प्रमुख फियोना डेविड ने कहा कि उत्तर कोरिया, इरिट्रिया और बुरुंडी में सरकार प्रायोजित बंधुआ मजदूरी कायम है, जो हैरत में डालती है। सबसे ज्यादा गुलामी की दर वाले देशों में केंद्रीय अफ्रीकी रिपब्लिक, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान और पाकिस्तान शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जी-20 के सदस्य देशों पर भी उंगली उठाई गई है। इन देशों में हर साल करीब 354 अरब डॉलर का ऐसा उत्पादन होता है जिसमें बंधुआ मजदूरी का खतरा रहता है। इनमें कंप्यूटर, मोबाइल फोन, मछली और इमारती लकड़ी जैसे काम शामिल हैं।

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संघर्ष व सरकारी दमन की भूमिका पर केंद्रित है रिपोर्ट 

वाक फ्री फाउंडेशन की ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स-2018 रिपोर्ट आधुनिक गुलामी में संघर्ष और सरकारी दमन की भूमिका पर केंद्रित है। अध्ययन में आधुनिक गुलामी के लिए दो प्रमुख कारण बताए गए हैं।

पहला तो बेहद दमनकारी शासन जिसमें लोगों को सरकार को सहारा देने के लिए काम पर लगाया जाता है और दूसरा टकराव की स्थिति, जिसमें कानून का शासन, सामाजिक संरचना और बचाव तंत्र बिखर जाता है। 

उत्तर कोरिया में जरूरी है बिना वेतन सामुदायिक श्रम

मानवाधिकार संगठन के शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट तैयार करते वक्त उत्तर कोरिया के 50 लोगों का इंटरव्यू भी लिया। इन लोगों ने कहा कि देश में वयस्कों और बच्चों के लिए बिना वेतन लिए सामुदायिक श्रम करना जरूरी है।

यहां बड़े पैमाने पर बंधुआ मजदूरों के सहारे खनन उद्योग चलता है। इन मजदूरों को कैदियों की तरह शिविरों में रखा जाता है। सरकार निचले वर्ग के लोगों को खदानों में कुछ ऐसे कामों के लिए भेजती है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपे जाते हैं।
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