अमेरिकी देशभक्ति बड़े जोर-शोर से ट्रेंड कर रही है। ट्विटर, फेसबुक और गूगल पर नहीं बल्कि पूरी फिजा देशभक्ति के तीन रंगों यानि लाल, नीला और सफेद की आगोश में है। चार जुलाई है, कोई मजाक थोड़ी है। दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क अपनी आजादी मना रहा है। और इस बार तो चुनावी साल है यानि सोने पर सुहागा। ये अमेरिका को फिर से महान बनाने का साल है, अमेरिकी सरहदों को पुख्ता करने का साल है, देशभक्ति को जताने का साल है, बाहर से आए लोगों को भगाने का साल है और उनके नाम पर अमरीकियों को डराने का साल है।दुकानों में तो देशभक्ति जैसे बरस रही है। चीन, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश में बनी चीजें अमेरिकी रंगों में लिपटकर धडाधड बिक रही हैं। चप्पल हो या चश्मा सब पर देशभक्ति की छाप है।
स्वमिंग पूल और समंदर के किनारे अपने गोरे जिस्मों को धूप में जलाकर भूरा करने की कवायद में लगी जवानियों को ढकने की नाकाम कोशिश कर रही नन्ही सी बिकिनी भी अमेरिकी देशभक्ति में रंगी हुई है। अंदाजा है कि चार जुलाई को पचास करोड बीयर की बोतलें सुडकी जाएंगी, पंद्रह करोड हॉट डॉग भकोसे जाएंगे, पिछले बरसों के मुकाबले कहीं ज्यादा झंडे खरीदे जाएंगे।
बीयर बनानेवाली कंपनी बडवाइजर ने तो अपना नाम बदल डाला है और बोतलों पर सिर्फ "अमेरिका" लिखा जाएगा। देशभक्ति और डॉलर-भक्ति दोनों ही फल-फूल रहे हैं। लेकिन अटलांटिक के उस पार यही देशभक्ति कहर बरपा रही है। जिस तेजी से देशभक्ति ऊपर जा रही है उसी तेजी से ब्रिटिश पाउंड जमीन पर लोट रहा है। ये गडबड कैसे हो गई? आजादी तो गुलाम रहे देश मनाते हैं। जिसने बरसों तक सिर्फ राज किया है उसे आजादी मनाने की जरूरत क्या थी?
जिसने हम अनपढ-गंवारों को अंग्रेजी बोलना सिखाया, डिवाइड ऐंड रूल की तालीम दी, एक काम को रोकने के सौ तरीकों वाली बाबूगिरी दी उस मुल्क से ऐसी गलती कैसे हो गई? चुनाव में किए गए वादों को सिरियसली थोडी न लेते हैं? ये बात डेविड कैमरन साहब कैसे भूल गए? चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि यूरोप से आजादी के लिए रेफरेंडम करवाएंगे। लेकिन पूरा करने की क्या जरूरत आन पडी थी। बल्कि अब आजादी का नारा लगानेवाले देशभक्तों के पास भी कुछ करने को रह नहीं गया है तो आने-जानेवालों पर मलबा फेंक रहे हैं।
अपनी पुरानी कॉलोनियों को ही देख लेते। चुनाव के दौरान कोई अखंड भारत की बात करता है तो कोई पाकिस्तान को सभी आतंकवादियों से मुक्त करने की बात करता है, लेकिन सचमुच ऐसा कोई करता है क्या? दुकान भी तो चलानी होती है।
गर्मियों का महीना था। भारत-पाकिस्तान के सियासतदान इन दिनों जरूरी काम से लंदन में ही होते हैं--कोई दिल के इलाज के लिए, कोई पुरानी बीवी के भाई के चुनाव में कैंपेनिंग के लिए तो कोई टेम्स नदी की सफाई के बारे में जानने के लिए।
कैमरन साहब, इन मंजे हुए लोगों में से किसी से तो मिल लेते। निहारी भी मिलती और सलाह भी। अब भुगतो। सुना है सभी पीठ पीछे हंस रहे हैं। लोग ये भी कह रहे हैं कि ब्रिटेन ने तो ट्रंप का मजाक उडाने का हक भी खो दिया।
आपको ये तो नहीं लगा कि अमेरिका में भी जो फिर से महान बनने की मुहिम चल रही है वो सचमुच में होने जा रहा है और लोग आप पर ऊंगलियां उठाएंगे कि उन्हें मौका नहीं दिया गया?लअरे सर कहां हो आप? देशभक्ति तो क्रिकेट और फुटबॉल के मैदानों पर या चुनावी वादों में ही भुनाने वाली चीज रह गई है। अमेरिका में भी वो जबतक डॉलर बरसाती है, तभी अच्छी लगती है। आपके देशभक्त भी नारे लगाते, फिर अपने काम में लग जाते। किसके चक्कर में फंस गए आप।
खैर, जिस बिल्डिंग में मैं रहता हूं वहां नोटिस लगा है कि इस बार चार जुलाई की शाम बीयर और खाना मुफ्त होगा लेकिन साथ में देशभक्ति का एक गीत भी गाना होगा। जाकर पूछता हूं कि इकबाल का लिखा "सारे जहां से अच्छा।।।" गाऊं तो चलेगा क्या?