फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अगर आज होते डायनासोर तो गाय के बराबर होते, खाते पेड़-पौधेः रिसर्च

Tue, 26 Sep 2017 08:49 PM IST
बीबीसी, हिंदी
विज्ञापन
डायनासोर - फोटो : File Photo
विज्ञापन
बहुत से ऐसे वाकियात हुए हैं, जो न होते, तो जाने क्या होता। दुनिया का रुख क्या होता? इंसानियत की तारीख क्या आज से अलग होती? बताया जाता है कि करीब 6 करोड़ 60 लाख साल पहले एक एस्टेरॉयड हमारी धरती से टकराया था।
विज्ञापन


इस टक्कर से जितनी ऊर्जा निकली थी, वो हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 10 अरब गुना ज्यादा थी। एस्टेरॉयड के टकराने से सैकड़ों मील दूर तक आग का गोला फैल गया था। इस टक्कर से समंदर में सुनामी की प्रलयकारी लहरें उठी थीं, जिन्होंने आधी दुनिया में तबाही मचा दी थी।

ये कयामत के आने जैसा था। हमारे वायुमंडल तक में आग लग गई थी। 25 किलो से ज्यादा वजन का कोई जानवर इस प्रलय में जिंदा नहीं बचा। कयामत इसे ही तो कहते हैं कि एस्टेरॉयड की टक्कर से धरती पर जीवों की 75 फीसद नस्लें हमेशा के लिए खत्म हो गईं।
विज्ञापन


डायनासोर की नस्लें हुईं तबाह
इसी प्रलय के चलते विशालकाय डायनासोर की तमाम नस्लें तबाह हो गई थीं। कुछ उड़ने वाले छोटे डायनासोर ही इस तबाही से बच सके थे। बाद में डायनासोर की ये नस्लें परिंदों में तब्दील हो गईं।

मगर, आज वैज्ञानिक ये सोचते हैं कि अगर वो एस्टेरॉयड धरती से न टकराया होता, तो क्या होता? या फिर अगर वो क्षुद्र ग्रह कुछ मिनट पहले धरती से टकराया होता। तो ये आज के मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप के बजाय गहरे समंदर में गिरा होता। इससे उतनी तबाही नहीं मचती, जितनी असल में मचती।

हाल ही में बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री के लिए कई वैज्ञानिकों ने ऐसी संभावनाएं तलाशी थीं। इनमें अमेरिका की टेक्सस यूनिवर्सिटी के शॉन गुलिक भी थी। वो भूवैज्ञानिक हैं। शॉन का मानना है कि अगर वो एस्टेरॉयड कुछ लम्हा पहले या बाद में धरती से टकराता तो या तो वो अटलांटिक महासागर में गिरता, या फिर प्रशांत महासागर में। इससे जो आग निकली, जो सल्फर का धुआं निकला, उसका असर धरती पर कम पड़ता।

ऐसा होता तो डायनासोर की नस्ल हमेशा के लिए नहीं खत्म होती। कुछ डायनासोर आज भी जिंदा होते। हालांकि उसके बाद भी धरती ने कयामत के कई मंजर देखे। शायद उनमें से भी कुछ बड़े डायनासोर बच जाते।

क्योंकि विकास के सिद्धांत के मुताबिक, डायनासोर को भी बचे रहने के लिए धरती के बदलते माहौल के हिसाब से खुद को ढालना पड़ता। तब हो सकता है कि कुछ डायनासोर हमेशा के लिए खत्म हो जाते। और शायद कुछ नस्लें बच भी जातीं। 
विज्ञापन

अगर जो वो डायनासोर बच जाते, तो क्या वो इंसानों के बराबर अक्लमंद होते?

डायनासोर - फोटो : File Photo
अगर डायनासोर होते तो आज के जो स्तनधारी जीव हैं, उनका क्या हश्र होता? क्या फिर इंसान और डायनासोर साथ-साथ धरती पर रहते? इस बात की कल्पना 2015 में बनी फिल्म 'द गुड डायनासोर' में की गई है।

कई वैज्ञानिक मानते हैं कि 6.6 करोड़ साल पहले अगर एस्टेरॉयड धरती से नहीं भी टकराया होता तो डायनासोर का युग खात्मे के कगार पर पहुंच जाता। ब्रिटेन की ब्रिस्टॉल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक माइक बेंटन कहते हैं कि धरती का माहौल सर्द हो रहा था, ऐसे में डायनासोर का बचना कमोबेश नामुमकिन सा था। वो धरती के क्रिटेशियस युग के आखिरी दिनों में बमुश्किल खुद को बचाए हुए थे। एस्टेरॉयड की टक्कर से करीब चार करोड़ साल पहले से डायनासोर की नस्ल का पतन हो रहा था।

बेंटन के मुताबिक आज की ही तरह, तब भी डायनासोर का नहीं, स्तनधारी जीवों का धरती पर बोलबाला होता।

डायनासोर की सैकड़ों नस्लें बची रहीं
डायनासोर करीब 23 करोड़ साल पहले विकसित हुए थे। वो आज के रेप्टाइल यानी सांप-छिपकली और मगरमच्छ के पूर्वज थे। इनमें से कुछ उड़ने वाले डायनासोर भी थे, जो आज के पक्षियों के पूर्वज थे।

वैज्ञानिकों ने अब तक मिले कंकालों की मदद से डायनासोर की करीब एक हजार नस्लों का पता लगाया है। इनमें से कुछ शाकाहारी थे, तो कुछ मांसाहारी। ज्यादातर डायनासोर विशाल आकार के हुआ करते थे। मगर कुछ इंसानों से भी छोटे थे। डायनासोर चार पैरों वाले भी होते थे और दो पैरों वाले भी। कुछ प्रजातियां उड़ भी सकती थीं। ये पूरी दुनिया में पाये जाते थे। डायनासोर की कुछ नस्लों के कंकाल भारत में भी मिले हैं, जो ज्वालामुखी के लावा की वजह से खत्म हो गए थे।

मांसाहारी डायनासोर पर रिसर्च करने वाले अमेरिकी विशेषज्ञ टॉम होल्त्ज मानते हैं कि डायनासोर की ज्यादातर नस्लें आज खत्म हो गई होतीं। मगर उन्हें ये यकीन है कि कुछ प्रजातियां आज भी बची होतीं, अगर धरती से एस्टेरॉयड की टक्कर नहीं होती।

ये हैं दुनिया के सबसे बड़े "भुक्खड़"
स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सीट के स्टीफेन ब्रुसेट का भी यही मानना है। स्टीफेन कहते हैं कि डायनासोर ने अपने दौर में बहुत बुरा वक्त झेला। फिर भी उनकी सैकड़ों नस्लें बची रही थीं। 16 करोड़ साल तक डायनासोर का धरती पर राज रहा था। विकास की प्रक्रिया में ये इतना आसान नहीं था। वो धरती के बदलते माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढालते आ रहे थे।

अगर डायनासोर आज भी जिंदा होते, तो उनके लिए चुनौतियां क्या-क्या होतीं?

पहली चुनौती तो धरती की बदलती आबो-हवा होती। उनके दौर में धरती का तापमान आज से 8 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। तब आज से ज्यादा जंगल थे, जिनसे उन्हें आसानी से चारा मिल जाता था। इस माहौल में कुछ सॉरोपॉड डायनासोर जिंदा रह जाते। वो आज की गायों के बराबर के होते। ऐसे कुछ डायनासोर के जीवाश्म यूरोप में मिले हैं। क्योंकि जब कयामत आई, तो 131 फुट लंबे टाइटैनोसॉर्स का दौर खत्म हो चुका था।

पेड़-पौधों पर निर्भर रहते
डायनासोर के दौर में धरती पर पाए जाने वाले पेड़-पौधे भी तेजी से बदल रहे थे। अगर विकास की वही प्रक्रिया होती, तो डायनासोर फूलों वाले पेड़-पौधों पर जिंदगी बसर कर रहे होते। ये कुछ आज के स्तनधारी घास खाने वाले जीवों जैसा ही होता।

फूल वाले पौधों के साथ ही धरती पर फल वाले पौधे भी विकसित हो रहे थे। उसी दौर में धरती पर स्तनधारी जीव और परिंदे भी विकसित हो रहे थे। शायद उड़ने वाले डायनासोर भी तब अपने आप को बचा पाते। वो फलों को खाकर खुद को बचाकर रखते। हो सकता है कि इनमें से कुछ डायनासोर बंदरों और चिंपैंजी जैसे पेड़ों पर बसर करते। शायद!
आज से करीब साढ़े तीन करो साल पहले दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका से अलग हो गया था। अंटार्कटिका पर भारी बर्फबारी की वजह से धरती के कई हिस्से सूख रहे थे। 

जंगलों की जगह घास के मैदान विकसित हो रहे थे। उसी दौर में घोड़े, जिराफ जैसे स्तनधारी चौपाए विकसित हो रहे थे। वैज्ञानिक मानते हैं कि डायनासोर की कुछ नस्लें भी इसी तरह अपने-आप को बदलकर बचाने में कामयाब होतीं।

टाइटैनिक डूबने का संदेश देने वाला एंटीना
शायद वो आज के दरियाई घोड़े या गैंडों जैसे होते। ढेर सारे दांतों वाले हाड्रोसॉर्स के जीवाश्म हमें मिले ही हैं, जिनके एक हजार दांत हुआ करते थे। जबकि आज के घोड़ों के चालीस दांत ही होते हैं। अब जिसके पास इतने दांत हों, उसके लिए चारा यानी घास चबाना आसान होता।

डायनासोर की आंखें भी तेज हुआ करती थीं। इसलिए वो अपने करीब आते खतरे को भी दूर से ही पहचान लेते। इसीलिए आज के घोड़ों या गायों के मुकाबले उनके बचने की उम्मीद ज्यादा थी।

कुछ उड़ने वाले डायनासोर, आज के चमगादड़ों की तरह ही खुद को बदलते माहौल के हिसाब से ढाल लेते। या शायद सांप-छिपकलियों की तरह वो बिल बनाना सीख जाते।

समुद्र में भी रहते
वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि डायनासोर की कुछ नस्लें शायद अपने आप को समंदर में रहने लायक बना लेतीं। क्योंकि डायनासोर के सारे ही जीवाश्म जमीन पर रहने वाले मिले हैं। बहुत से विशाल डायनासोर आज की व्हेलों की तरह, समंदर को अपना आशियाना बना सकते थे। और अंडे देने के लिए जमीन पर आते। इक्थियोसॉर्स और प्लेसियोसॉर्स जैसे कुछ डायनासोर ऐसा ही करते थे। अगर जमीन पर, हवा में या समंदर में रहने वाले डायनासोर आज भी बचे रहते, तो आज के परिंदों या स्तनधारी जीवों का फिर क्या होता?

वैज्ञानिक टॉम होल्त्ज मानते हैं कि परिंदे तो पहले ही खुद को डायनासोर के साथ रहने के लिए ढाल चुके थे। अब अगर डायनासोर की नस्लें आज तक जिंदा होतीं, तो उनके शरीर के साथ-साथ उनका दिमाग भी विकसित होता।
तो क्या आज अगर डायनासोर होते, तो उनकी अक्ल इंसानों के बराबर या उन से ज़्यादा होती?

अगर ऐसा होता, तो शायद वो आज की साइंस-फिक्शन फिल्मों में दिखने वाले एलियन्स जैसे होते! या शायद ऐसा नहीं होता। हां, वो आज की गायों, घोड़ों और तोतों जैसे दिखने वाले होते। उनका मुकाबला इंसानों से नहीं, दूसरे जानवरों से होता। और फिर जो बच रहते, वो इंसानों के साथ आराम से धरती पर रहते। पर ये सब तब होता, जब वो एस्टेरॉयड धरती से नहीं टकराई होती। पर ऐसा हुआ और डायनासोर खत्म हो गए।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें