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क्या बातचीत से सुलझेगा देवयानी मामला?

Sat, 21 Dec 2013 02:23 PM IST
जुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता
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ऐसा लगता है भारत अपने राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के मामले में जितना क़दम उठा रहा है या जो बयान दे रहा है, अमेरिका के ऊपर इसका अधिक असर नहीं पड़ रहा है।
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इससे पहले विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने ये पूछा भी कि देवयानी खोबरागड़े के मामले को निपटाने का अमेरिकी विदेश विभाग के पास कोई तो विकल्प होगा।

ये शब्द इस तरह से कहे गए थे जिस में थोड़ी उम्मीद, थोड़ी लाचारी की मिली जुली झलक दिखाई दे रही थी।

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विदेश मंत्री ने इस बात पर भी एक बार से अधिक बल दिया कि बस अब बहुत हुआ, अब दोनों पक्षों के बीच बातचीत होनी ही चाहिए।

उन्होंने लगभग विजयी अंदाज़ में कहा ये भी कहा कि खोबरागड़े का तबादला अब संयुक्त राष्ट्र के भारतीय मिशन में हो गया है जहां उन्हें पूरी राजनयिक इम्यूनिटी हासिल है।

कानूनी कार्रवाई में दखल
लेकिन कुछ घंटों के बाद ही उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। अमेरिकी विदेश विभाग ने स्पष्ट कर दिया कि उनका महकमा खोबरागड़े के मुक़दमे में अमेरिकी क़ानूनी कारवाई में दखल नहीं देगा।
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हां, अगर अमेरिका के सख्त रवैये से भारत को मायूसी हुई होगी तो अमेरिकी विदेश विभाग के इस फैसले से और भी अधिक धक्का लगा होगा कि खोबरागड़े के संयुक्त राष्ट्र स्थित भारतीय उच्चायोग में तबादले के बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे में कोई बदलाव नहीं आएगा।

विदेश विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि राजनयिक इम्यूनिटी के स्तर में कोई भी बदलाव उसी दिन से लागू हो सकता है जिस दिन राजनयिक की नई पदवी को मंज़ूरी मिलती है।

भारत की तरफ से अब तक 'टिट फॉर टैट' यानी 'जैसे को तैसा' वाली कूटनीति अपनाई गई है। अमेरिका अब तक अपने देश के कानून का सहारा ले रहा है।

दोनों देशों के बीच एक तरह से राजनयिक गतिरोध सा पैदा हो गया है।

तो अब सवाल ये पैदा होता है कि भारत यहां से आगे कैसे बढ़े? कौन सा विकल्प अपनाए कि देवयानी खोबरागड़े देश वापस आ सकें? या कम से कम ये उनके ख़िलाफ़ मुकदमा वापस ले लिया जाए?

बातचीत का विकल्प
बातचीत ही अकेला विकल्प नज़र आता है। खुद सलमान खुर्शीद ने बातचीत की अहमियत पर ज़ोर दिया है और बातचीत उच्चस्तर की हो तो मामला जल्द सुलझ सकता है।

कई साल पहले जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री की हैसियत से अमेरिका के दौरे पर गए थे तो अपनी मां के दोस्त मोहम्मद यूनुस के बेटे को अमेरिकी जेल से रिहा करवाकर भारत ले आने में कामयाब हुए थे, तो खोबरागड़े की वापसी भी मुमकिन है।

भारत की मांग है कि अमेरिका माफ़ी मांगे और इसके लिए शायद अमेरिका कभी तैयार न हो लेकिन वह भी बातचीत के लिए तैयार नज़र आता है। बल्कि निचले स्तर पर वार्तालाप हो भी रही है जैसा कि अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता मैरी हार्फ़ का कहना है कि भारतीय और अमेरिकी अधिकारी इस मामले पर लगातार बात कर रहे हैं।
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उन्होंने कहा है, "हमारी कोशिश ये है कि माहौल को शांत किया जाए और जो क़ानूनी प्रक्रिया है, उसे चलने दिया जाए।''

भारत की तरफ से अमेरिकी बयान के दूसरे हिस्से पर यानी 'क़ानूनी प्रक्रिया' को ख़त्म कराने पर ज़ोर दिया दिया जाना चाहिए।

आखिर दोनों देशों के बीच केवल कारोबारी रिश्ते ही मजबूत नहीं है बल्कि उनके लिए सामरिक रिश्ते भी अहम हैं। भारत को अमेरिका की उतनी ही ज़रुरत है जितनी अमेरिका को भारत की और इसका इक़रार राष्ट्रपति ओबामा पिछले कुछ सालों में कई बार कर चुके हैं।
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