अमरीकी संस्था क्रॉल इंक की ओर से दुनिया भर में कराए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015-2016 में भारत की 80 फीसद कंपनियां धोखाधड़ी का शिकार हुईं। साल 2013-2014 में ऐसी कंपनियों की संख्या 69 फीसद थी। सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में होने वाली कॉरपोरेट धोखाधड़ी में भ्रष्टाचार और घूस का हिस्सा 25 फीसद से अधिक है।
ये सर्वे बताता है कि कॉरपोरेट धोखाधड़ी के मामले में भारत तीसरे नंबर पर है। हालाँकि भारत के संदर्भ में इस तरह की रिपोर्ट से किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में धोखाधड़ी आसान हो गई है।
उद्योग घरानों या विभागों की तरफ से ख़बरें लीक़ की या कराई जाती हैं और इस तरह नियम-कायदों को ताक पर रखकर फ़ायदा उठाया जाता है। कॉरपोरेट धोखाधड़ी के नए-नए तरीके ईजाद कर लिए गए हैं। कभी टेलीफोन टेप किए जाने की खबरें आती हैं, कभी राजनेताओं को नीतियां बनाने के लिए रकम देने की बात भी सामने आती है।
पूर्व की सरकारें भी दावे तो बड़े-बड़े करती रही हैं लेकिन असल में कुछ नहीं हुआ
कॉरपोरेट धोखाधड़ी
- फोटो : BBC
सरकारी ठेकों में पक्षपात किसी से छिपा नहीं है। जहाँ तक कॉर्पोरेट धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार रोकने की बात है तो यही नहीं, पूर्व की सरकारें भी दावे तो बड़े-बड़े करती रही हैं, लेकिन असल में कुछ नहीं हुआ।
जिस तरीके की हमारी चुनाव व्यवस्था है, जिस तरह से हमारे राजनीतिक दल काला धन लेकर चुनाव लड़ते हैं और चुनकर संसद या विधानसभा में पहुँचते हैं जब वही मंत्री बनते हैं तो उद्योग घराने चाहेंगे कि उन्हें फायदा पहुँचाया जाए। यही वह भ्रष्ट गठबंधन (राजनेताओं और उद्यमियों) है जो भारत के भ्रष्टाचार के मूल में है।
इस सर्वे के असर भारत की छवि पर पड़ने वाले असर की बात करें, तो निश्चित तौर पर इस तरह की रिपोर्ट का असर विदेशी निवेश पर हो सकता है। भ्रष्टाचार रोकने की जो बड़ी-बड़ी बातें होती हैं उन्हें अमल में लाना होगा और भ्रष्ट तंत्र को खत्म करना होगा।