एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत में अपने भव्य स्वागत से अभिभूत हैं, वहीं तालिबान के साथ शांति बहाली को लेकर उनके रुख में ज़रा भी नरमी देखने को नहीं मिल रही है। तालिबान के बड़े नेता सिराजुद्दीन हक्कानी ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि शांति बहाली की हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिका नहीं चाहता कि इलाके में शांति कायम हो। हक्कानी का कहना है कि अमेरिका के साथ बातचीत की कोशिश करते हुए 18 महीने हो गए, इससे पहले भी कई कोशिशें हुईं, लेकिन अमेरिकी मंशा पर लगातार संदेह बना हुआ है। बावजूद इसके तालिबान अपनी कोशिश जारी रखेगा और अमेरिका के साथ एक बार फिर बातचीत की कोशिश करेगा।
हक्कानी ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा है कि इतने लंबे समय से चल रहे युद्ध से सभी को बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है। करीब चार दशकों में तमाम लोगों ने अपने बहुत से प्रियजनों को खो दिया है। हर कोई युद्ध से ऊब चुका है और इसे तत्काल बंद होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि हमने खुद अपने लिए युद्ध नहीं चुना है, हम अपनी आत्मरक्षा के लिए लड़ते आए हैं। हमेशा से हमारी पहली मांग रही है कि अमेरिकी सेना को वापस बुलाया जाए। इसी आधार पर आज भी हम शांति समझौता करना चाहते हैं।
हक्कानी ने कहा है कि उनके साथी मुल्ला अब्दुल गनी बरादर और शेर मोहम्मद अब्बास स्टैंकजई पिछले 18 महीनों से लगातार अमेरिका के साथ बातचीत करने की कोशिशों में लगे हैं। लेकिन अमेरिकी सेना के हमले हमारे गांवों पर लगातार जारी हैं।
हक्कानी ने लिखा है कि राष्ट्रपति ट्रंप के सख्त रूख और बातचीत बंद कर देने के बाद भी तालिबान ने बातचीत और शांति के लिए अपने दरवाज़े खोल रखे हैं। अमेरिकी सेना की वापसी को लेकर अफगानिस्तान सरकार और तालिबान को भी साथ मिलकर एक सहमति बनानी पड़ेगी। उन्होंने भरोसा जताया कि बिना विदेशी हस्तक्षेप के अगर व्यापक अफगानियों के हितों की बात की जाए तो जल्द से जल्द यह समझौता बहुत जरूरी है। हमें पूर्वाग्रह से हटकर बातचीत को आगे बढ़ाते हुए किसी समझौते पर पहुंचना चाहिए।
हक्कानी ने लिखा है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि विदेशी ताकतों के प्रभाव से मुक्त होकर सभी अफगानी मिलकर अपने देश में एक बेहतर इस्लामिक व्यवस्था लागू करने में कामयाब होंगे जो सभी अफगानियों के हित में होगा, जिसमें सभी को शिक्षा और सबको काम की गारंटी होगी। हालांकि हक्कानी ने महिलाओं की आजादी को लेकर जो मूल सवाल हमेशा से उठाए जाते रहे हैं, उसे लेकर कोई साफ राय नहीं दी है। उन्होंने महिलाओं को भी इस्लाम के नियमों के मुताबिक चलने की बात ही दोहराई है।
दरअसल महिलाओं को लेकर तालिबानियों का रवैया हमेशा से ही बहुत क्रूर और अमानवीय माना जाता रहा है और इसकी कई मिसालें पहले भी मिलती रही हैं। ऐसे में हक्कानी नेटवर्क के मुखिया की शांति बहाली को लेकर इतनी बेचैनी अमेरिकी सेना के आतंक का ही नतीजा है। ट्रंप के सख्त रवैये से भी तालिबानियों में हड़कंप नजर आ रहा है, लेकिन किसी भी तरह अगर शांति बहाली का कोई रास्ता निकले तो बेशक यह एक सकारात्मक बात होगी।