कोरियाई प्रायद्वीप पहले भी युद्ध झेल चुका है। 1950 में उत्तर कोरिया के मौजूदा सुप्रीम नेता किम जोंग उन के दादाजी किम इल सुंग ने दक्षिण कोरिया पर हमला करने का फ़ैसला लिया था। अमरीका ने मामले में मध्यस्थता करने की कोशिश की ताकि युद्ध को रोका जा सके। तनाव तीन साल तक जारी रहा और इससे जन-धन दोनों का ही भारी नुक़सान हुआ।
छह दशक बाद आज इस प्रायद्वीप में फिर से एक अलग तरह का तनाव देखने को मिल रहा है। अपने परमाणु परीक्षणों से किम जोंग उन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चुनौती दे रहे हैं। इस महीने की शुरूआत में उत्तर कोरिया ने सफ़ल इंटरक़ॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण किया और दावा किया कि ये मिसाइलें अलास्का तक हमला कर सकती हैं।
इसके तुरंत बाद अमरीकी विदेश मंत्री ने इस बारे में बयान जारी कर इस परीक्षण की कड़ी निन्दा की और कहा, "इस मिसाइल का परीक्षण करने से अमरीका, हमारे सहयोगियों, इस क्षेत्र और सारी दुनिया के लिए ख़तरा और बढ़ गया है।"
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगले तीन सालों के भीतर उत्तर कोरिया ऐसे मिसाइल बना लेगा जो लॉस एंजिल्स शहर तक पहुंचने में सक्षम होंगे। इधर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी चेतावनी दी है कि तनाव जारी रहा तो उत्तर कोरिया के साथ "एक बड़े संघर्ष" की संभावना है। अगर इस प्रायद्वीप में मौजूदा टकराव की स्थिति बढ़ी तो क्या होगा, ख़ास कर तब जब विश्व की बड़ी परमाणु शक्तियों की दिलचस्पी इस प्रायद्वीप में है?
1950 में कोरिया का युद्ध शुरू हुआ। उस वक्त विश्व की महाशक्तियां अमरीका और सोवियत संघ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व के कई देशों की तरह अपने पुनर्गठन में लगे थे। प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्से पर सोवियत संघ ने कब्ज़ा कर लिया था जबकि अमरीका दक्षिणी हिस्से पर सैन्य मदद दे रहा था।
जून 25 को सोवियत संघ और चीन से समर्थन ले कर उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर धावा बोल दिया। अमरीका ने 'कम्युनिस्टों के हमले' का सामना करने के लिए दक्षिण कोरिया में अपनी सेनाएं भेजीं। अमरीका की मदद से दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल को दो महीनों के भीतर आज़ाद भी करा लिया गया। लेकिन प्रायद्वीप को एक करने के लिए अमरीका की अपनी सेनाओं को उत्तर की तरफ़ भेजने के फ़ैसले का चीन ने कड़ा विरोध किया।
सभी पक्ष एटम बमों और परमाणु बमों की बातें करने लगे। जल्दी ही कोरिया प्रायद्वीप को एक करने के लिए शुरू की गई मुहिम तीसरे (परमाणु ) विश्व युद्ध बनने की कग़ार पर पहुंच गई। तीन साल के तनाव के बाद मामला शांत हुआ और वो भी बिना किसी औपचारिक शांति समझौते के। इलाके में जो बाकी बचा वो थी तबाही।
अमरीका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए में कोरियाई मामलों की जानकार सू टेरी बताती हैं, "लाखों कोरियाई नागरिक मारे गए, क़रीब एक लाख़ बच्चे अनाथ हुए, एक करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ा।" वो कहती हैं, "प्योंगयांग पूरी तरह तबाह हो चुका था। एक भी इमारत नहीं बची थी जो आपको सही सलामत दिख जाए।"