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श्रीलंका: क्या राजपक्षे परिवार का सियासी दबदबा खत्म होने की हो गई शुरुआत?

Tue, 10 May 2022 06:00 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि महिंदा राजपक्षे के इस्तीफे से देश की आर्थिक मुसीबत के समाधान की कोई राह नहीं निकली है। इन्हीं मुश्किलों के कारण हजारों लोग देश भर में एक महीने से भी ज्यादा समय से सरकार विरोधी आंदोलन में शामिल रहे हैं। सोमवार को राजपक्षे परिवार ने अपने समर्थकों से आंदोलनकारियों पर हमला करवा कर उन्हें कोलंबो से हटाने की कोशिश की...
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श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के इस्तीफे के साथ ही यहां यह अनुमान लगाया जाने लगा है कि देश की सियासत पर अब राजपक्षे परिवार की पकड़ का अब अंत होने वाला है। 1948 में ब्रिटिश राज से श्रीलंका के आजाद होने के बाद देश की राजनीति में जिन दो परिवारों का दबदबा रहा, उनमें एक राजपक्षे परिवार भी है। इसके पहले दशकों तक भंडारनायके परिवार का दबदबा रहा था।

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विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि महिंदा राजपक्षे के इस्तीफे से देश की आर्थिक मुसीबत के समाधान की कोई राह नहीं निकली है। इन्हीं मुश्किलों के कारण हजारों लोग देश भर में एक महीने से भी ज्यादा समय से सरकार विरोधी आंदोलन में शामिल रहे हैं। सोमवार को राजपक्षे परिवार ने अपने समर्थकों से आंदोलनकारियों पर हमला करवा कर उन्हें कोलंबो से हटाने की कोशिश की। लेकिन ये दांव उलटा पड़ गया। कोलंबो में हुई हिंसा में पांच लोगों की मरने की खबर है।

महिंदा रहे हैं काफी लोकप्रिय

देश के बड़े जनमत में ये सोच गहरा गई है कि राजपक्षे परिवार ने देश के आर्थिक संकट का हल ढूंढने की कोशिश नहीं की। इसीलिए अब राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे सहित इस परिवार के सभी लोगों को सत्ता से बाहर करना आंदोलनकारियों का प्रमुख एजेंडा बन गया है। विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि राजपक्षे परिवार की राजपरिवार जैसी हैसियत बनाने में सबसे बड़ी भूमिका महिंदा की ही रही है। वे इस परिवार के सबसे लोकप्रिय नेता रहे हैं। अलगाववादी तमिल संगठन एलटीटीई के खिलाफ जब श्रीलंकाई सेना ने जीत हासिल की, तब महिंदा ही राष्ट्रपति थे। इसका पूरा श्रेय उन्हें मिला। यही उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण रहा है।

जबकि राजपक्षे परिवार पर भ्रष्टाचार और नागरिक अधिकारों के हनन के गंभीर आरोप रहे हैं। महिंदा राजपक्षे 2005 में राष्ट्रपति चुने गए थे। उनके पहले पांच वर्ष के कार्यकाल में मानवाधिकारों के खुलेआम हनन के आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक उस अवधि में 40 हजार से ज्यादा तमिल नागरिकों की जान गई। इसके लिए तत्कालीन राष्ट्रपति को ही दोषी माना गया था।

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महिंद राजपक्षे पहली बार 1970 में 24 वर्ष की उम्र में राजनीतिक पद पर निर्वाचित हुए थे। वे 2004 में प्रधानमंत्री बने। एक साल बाद वे राष्ट्रपति चुने गए। 2010 में एक और कार्यकाल के लिए वे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। लेकिन 2015 में आश्चर्यजनक रूप से वे अपनी ही पार्टी के पूर्व सचिव मैत्रिपाला सिरिसेना से हार गए। सिरिसेना ने विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था।

आर्थिक संकट के लिए परिवार को माना जिम्मेदार

इसके बाद 2019 के चुनाव में उन्होंने अपने भाई गोटबया को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। उनके जीतने के बाद वे खुद प्रधानमंत्री बने। इस दौरान इस परिवार के कई और सदस्य मंत्री या दूसरे सरकारी पदों पर बैठे। इसीलिए पिछले साल जब आर्थिक संकट की शुरुआत हुई, तो देश में इस परिवार को ही इसके लिए जिम्मेदार माना गया। धीरे-धीरे ये परिवार आंदोलनकारियों के आक्रोश का निशाना बन गया।

सोमवार को राजपक्षे समर्थकों के हमले में आंदोलनकारी अरुणा निशांता भी जख्मी हुए। उन्होंने लोगों के बदले मूड के बारे में टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा- ‘जब प्यार नफरत में बदल जाता है, तो ऐसा ही होता है। महिंदा राजपक्षे के परिवार के पास आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा धन होने और उनकी हाई लाइफस्टाइल के बावजूद लोगों ने लंबे समय तक उनका सम्मान किया। उन पर भरोसा किया। लेकिन अब समय आ गया है, जब उन सबको जाना होगा। अगर उन्होंने स्वेच्छा से ऐसा नहीं किया, तो लोग उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर कर देंगे।’

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