अफगानिस्तान में अगस्त के बाद बनने वाली संभावित हालत को लेकर रूस और ईरान के बाद अब चीन भी सक्रिय हो गया है। इस सिलसिले में चल रही कूटनीतिक पहल के बीच इन तीनों देशों की भूमिका सबसे अहम बन कर उभरी है। अब ऐसा समझा जा रहा है कि ये तीनों देश अफगानिस्तान की मौजूदा अशरफ ग़नी सरकार से ज्यादा महत्व तालिबान को दे रहे हैं।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पिछले हफ्ते अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्लाह मोहीब मास्को में रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव निकोलाई पेत्रुशेव से मिले। बताया जाता है कि मोहीब ने पेत्रुशेव को ये समझाने की कोशिश की कि मौजूदा अफगान सरकार ही अफगानिस्तान में स्थिरता की गारंटी कर सकती है। लेकिन वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पेत्रुशेव ने अशरफ गनी सरकार को मदद देने का कोई ठोस वादा नहीं किया।
इसके विपरीत इस हफ्ते जब तालिबान का प्रतिनिधिमंडल मास्को गया, तो उसकी बातों को ज्यादा गंभीरता से सुना गया। तालिबान ने रूस को आश्वासन दिया कि वह मध्य-एशियाई देशों की सीमा के अंदर कोई घुसपैठ नहीं करेगा। गौरतलब है कि तीन महीने पहले भी तालिबान के प्रतिनिधिमंडल को उस समय मास्को आमंत्रित किया गया था, जब रूस ने चीन और पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान की भावी स्थिति को लेकर एक त्रिपक्षीय बैठक आयोजित की थी। विश्लेषकों के मुताबिक रूस के रणनीतिकारों को इस बात का अहसास है कि तालिबान अब अफगानिस्तान में सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए महत्व सिर्फ उसके ही आश्वासनों का है।
इस बीच चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने अफगानिस्तान की हालत पर चर्चा के लिए अपनी मध्य एशियाई देशों की यात्रा का कार्यक्रम का घोषित किया है। इसके अलावा वे इसी मुद्दे पर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के अधिकारियों से भी बातचीत करेंगे। चीन समर्थक अखबार द ग्लोबल टाइम्स से बीजिंग स्थित विश्लेषकों ने कहा है कि अफगानिस्तान में बन रही स्थिति को चीन अपने लिए चुनौती और अवसर दोनों रूपों में देख रहा है। उसकी समझ है कि अफगान मुद्दे को एससीओ के मंच पर लाकर चीन ना सिर्फ अफगानिस्तान की हालत स्थिर करने में मददगार बन सकता है, बल्कि इसके जरिए वह मध्य एशियाई देशों के साथ अपने रिश्तों को भी और मजबूत बना सकता है।
वांग यी अगले 12 से 16 जुलाई तक तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान की यात्रा पर जाएंगे। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक इस यात्रा के लिए वांग को उन तीनों देशों से आमंत्रण मिला है। उसके बाद वांग एससीओ के अफगानिस्तान कॉन्टैक्ट ग्रुप की बैठक में भाग लेंगे। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक एससीओ की उस बैठक में अफगानिस्तान में विभिन्न पक्षों के बीच मेलमिलाप कराने और एससीओ के साथ अफगानिस्तान के रिश्ते मजबूत करने के उपायों पर विचार होगा।
इस बीच तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन के इस बयान को भी काफी अहमियत दी जा रही है कि तालिबान चीन को अफगानिस्तान के एक दोस्त के रूप में देखता है। वह अफगानिस्तान में निवेश और अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भूमिका निभाने के लिए जल्द ही चीन से बातचीत शुरू करेगा। शहीन हाल के समय में तालिबान का अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन कर उभरे हैं। उन्होंने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि तालिबान का देश के 85 फीसदी हिस्सों पर तालिबान का कब्जा हो चुका है। अब वह यह कहने की स्थिति में है कि वह अफगानिस्तान में चीनी निवेश और हितों को पूरी सुरक्षा प्रदान करेगा।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक तालिबान की बढ़ी ताकत के कारण ही अब वे देश उसे ज्यादा अहमियत दे रहे हैं, जो अफगानिस्तान में स्थिरता लाने के प्रयासों से जुड़े हुए हैं। ईरान में बुधवार और गुरुवार को इस सिलसिले में हुई बैठक सबके ध्यान का केंद्र तालिबान ही रहा। गौरतलब है कि तालिबान ने अफगानिस्तान में किसी संक्रमणकालीन सरकार में भाग लेने से साफ इनकार कर दिया है। इसीलिए विदेशी ताकतें अभी किसी दूसरे अफगान पक्ष को वैसा महत्व नहीं दे रही हैं, जिससे तालिबान खफा हो।