अफगानिस्तान पर शासन कर रहे इस्लामी संगठन तालिबान के सर्वोच्च नेतृत्व में फूट पड़ जाने की खबरें चर्चा में हैं। हालांकि इससे तालिबान में विभाजन होने का अंदाजा अभी नहीं लगाया जा रहा है, फिर भी इस घटनाक्रम के दूरगामी प्रभाव होने के कयास यहां लगाए गए हैं। पिछले महीने गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने खोश्त स्थित एक मदरसे के एक समारोह को संबोधित करते हुए तालिबान सरकार के कामकाज को लेकर असंतोष जताया था। उन्होंने कहा था कि सत्ता पर एकाधिकार कायम किया जा रहा है और सरकार की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई जा रही है, जो तालिबान के हित में नहीं है। सिराजुद्दीन ने समारोह को पहले से रिकॉर्ड किए गए भाषण के जरिए संबोधित किया था। यह भाषण इंटरनेट पर वायरल हो गया।
हालांकि हक्कानी ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन अनुमान लगाया गया है कि उनके निशाने पर तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला हैबतुल्लाह अखुंदजादा थे। समझा जाता है कि अखुंदजादा और हक्कानी के बीच मतभेद गहरा गए हैं। वैसे तालिबान सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले वे इस संगठन के अकेले नेता नहीं हैं। कई अन्य नेताओं ने भी उन नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं, जिनकी वजह से अफगान आवाम का एक हिस्सा तालिबान से दूर हो गया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान लगातार अलग-थलग पड़ा हुआ है।
कार्यवाहक रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब ने फरवरी के मध्य में कहा था कि तालिबान को अक्खड़पन नहीं दिखाना चाहिए। उसे लोगों की वाजिब मांगों को मानने की कोशिश करनी चाहिए। याकूब तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे हैँ। फूट की चर्चाओं के बारे में तालिबान का पक्ष जानने के लिए वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने तालिबान प्रवक्ता जबिउल्लाह मुजाहिद से संपर्क किया। तब मुजाहिद ने इस कयासों का खंडन किया। उन्होंने कहा- ‘मंत्रियों ने हाल जो सार्वजनिक भाषण दिए, उनमें उन्होंने सरकार की आलोचना नहीं की। उन्होंने सरकार को कुछ सुझाव भर दिए हैं। सभी मंत्री लोगों की बेहतरी ही चाहते हैं।’
लेकिन विदेशी पर्यवेक्षकों के मुताबिक तालिबान चाहे जो कहे, सच यह है कि इस संगठन के भीतर अंदरूनी झगड़े लगातार हो रहे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगेलमैन के मुताबिक तालिबान अपने मतभेदों को आंतरिक रूप से सुलझाने की कला सीख गया है। इसलिए विवाद के बारे में बात बाहर नहीं आती है। उन्होंने कहा- इसलिए खुली बगावत की संभावना तो नहीं है, लेकिन हक्कानी का सार्वजनिक रूप से बयान देना विवाद को बढ़ाने की उनकी कोशिश का हिस्सा माना जाएगा। कुगेलमैन ने कहा- ‘पहले वरिष्ठ नेतृत्व असहमति को दबा देता था और असहमत लोगों के साथ हिंसा की जाती थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। तभी सर्वोच्च नेता के आलोचक अभी तक सरकार में बने हुए हैं।’
कई पर्यवेक्षकों ने हालिया बयानों को इस बात का संकेत माना है कि तालिबान के अंदर अपना तौर-तरीका बदलने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। तालिबान का एक गुट यह समझ रहा है कि अखुंदजादा के कट्टरपंथी रवैये से तालिबान की अंतरराष्ट्रीय छवि बिगड़ी है। खास कर स्कूलों में लड़कियों की पढ़ाई रोकने को लेकर अफगानिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हुई है। अब तालिबान के कुछ नेता ऐसे कदमों पर असंतोष जता रहे हैं।