अफगानिस्तान के पहाड़ी इलाकों में हाल ही में आए विनाशकारी भूकंप ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक 49 गांवों में 5230 घर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं और 672 घर क्षतिग्रस्त हुए हैं। लेकिन 441 प्रभावित गांवों में से 362 गांवों तक अभी तक राहत और बचाव टीमें पहुंच ही नहीं पाई हैं।
31 अगस्त को आया था विनाशकारी भूकंप
बता दें कि, यह भूकंप 31 अगस्त को आया था, जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6.0 मापी गई। अब तक कम से कम 2,200 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। अधिकारियों का कहना है कि जैसे-जैसे मलबे से शव निकाले जाएंगे, मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि इस आपदा से लगभग पांच लाख लोग प्रभावित हुए हैं, जिनमें आधे से अधिक बच्चे हैं। इनमें कई ऐसे शरणार्थी भी शामिल हैं जिन्हें हाल ही में पाकिस्तान और ईरान से जबरन वापस भेजा गया था।
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राहत कार्य में बड़ी मुश्किलें
यूएन की अफगानिस्तान स्थित मानवीय सहायता प्रमुख शैनन ओ'हारा ने बताया कि पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में सड़कें बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के कारण राहत टीमों के लिए प्रभावित गांवों तक पहुंचना बेहद कठिन हो गया है। उन्होंने कहा कि जलगांवाबाद शहर से भूकंप के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके तक पहुंचने में उन्हें साढ़े छह घंटे का समय लगा, जबकि यह दूरी केवल 100 किमी है। रास्ता एक संकरी पहाड़ी सड़क है, जो कई जगहों पर भूस्खलन से गिरे बड़े पत्थरों से बंद हो चुकी है। इसी रास्ते से ही मानवीय सहायता से लदे ट्रक भी ऊपर-नीचे जा रहे हैं, जिससे जाम की स्थिति पैदा हो रही है।
पैदल लौट रहे हैं घायल और भूकंप पीड़ित
ओ'हारा ने बताया, 'जब हम भूकंप के केंद्र की ओर जा रहे थे, तभी हमें कई परिवार पैदल लौटते मिले। वे केवल वही सामान ले जा पा रहे थे, जो अपने हाथों में उठा सकते थे। कई लोग उसी रात के कपड़ों में थे, जब भूकंप आया था। मां-पिता अपने घायल बच्चों को गोद में लिए हुए थीं, जिनके शरीर पर ताजे पट्टे बंधे थे।'
पूरे गांव मिट गए, लाशों की बदबू फैली
जैसे-जैसे राहत टीम केंद्र की तरफ बढ़ी, तबाही का मंजर और भयावह होता गया। कई गांव पूरी तरह मिट्टी में दब गए हैं। जगह-जगह मरे हुए जानवरों की सड़ती लाशों की बदबू फैली हुई है। जिन परिवारों के घर तबाह हो गए, वे भीड़भाड़ वाले टेंटों में रह रहे हैं, जबकि कई लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं। बारिश और ठंडी हवाएं उनकी परेशानी और बढ़ा रही हैं।
पानी और स्वच्छता की गंभीर समस्या
ओ'हारा ने चेतावनी दी कि स्थिति बेहद नाजुक है। पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं है। स्वच्छता की कोई व्यवस्था नहीं है। शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि 92% गांव खुले में शौच करते हैं। इस क्षेत्र में पहले से ही हैजा बीमारी आम है। ऐसे में महामारी फैलने का खतरा बहुत ज्यादा है। उन्होंने कहा कि प्रभावित लोगों को तुरंत साफ पानी, भोजन, टेंट, शौचालय और गर्म कपड़े चाहिए। सर्दियों की पहली बर्फबारी अक्तूबर के आखिर में शुरू हो जाएगी, जिसके बाद इन गांवों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा।
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आगे बढ़ सकती है और परेशानी
ओ'हारा ने कहा, 'अगर अभी तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो बरसात के कारण फ्लैश फ्लड आ सकते हैं, जो शिविरों को बहा ले जाएंगे। लगातार आफ्टरशॉक्स से भूस्खलन हो सकता है, जिससे राहत मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएंगे। और अगर बर्फबारी शुरू हो गई, तो इन गांवों तक पहुंचना नामुमकिन हो जाएगा। अगर हम अभी नहीं चेते, तो ये लोग आने वाली सर्दी में जिंदा नहीं बच पाएंगे।' संयुक्त राष्ट्र मंगलवार को एक आपातकालीन फंडिंग अपील जारी करेगा ताकि राहत कार्यों के लिए तुरंत पैसा इकट्ठा किया जा सके।
तालिबान की भूमिका और महिलाओं की स्थिति
ओ'हारा ने बताया कि अफगानिस्तान की सत्तारूढ़ तालिबान सरकार ने इस बार राहत और बचाव कार्यों में कोई बाधा नहीं डाली है और शुरुआती खोज एवं बचाव अभियान तालिबान की अगुवाई में ही हुआ। महिलाओं और लड़कियों की स्थिति पर उन्होंने कहा कि अभी तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली है कि पुरुष-प्रधान बचाव टीमों ने महिलाओं को पीछे छोड़ दिया हो। संयुक्त राष्ट्र ने यह सुनिश्चित किया है कि स्वास्थ्य सेवाओं और राहत वितरण में महिलाओं की भागीदारी बनी रहे।