तालिबानी फरमान के डर से मीडिया में काम करने वाली लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी नौकरी खो दी है, और देश में लगभग 1.8 करोड़ महिलाएं स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद से महिलाओं पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं। ताजा मामला है घोर प्रांत का जहां एक महिला ने तालिफानी फरमान से डरकर पहले ही आत्महत्या कर ली। दरअसल, तालिबान ने शुक्रवार को एक विवाहित पुरुष के साथ घर से भागी महिला पर पथराव करने की योजना बनाई थी, लेकिन इससे पहले ही महिला ने सार्वजनिक अपमान से बचने के लिए अपनी जान ले ली। वहीं जिस व्यक्ति के साथ महिला घर से भागने वाली थी उसे भी गुरुवार 13 अक्तूबर को फांसी दे दी गई।
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अवैध तरीके से शादी करने पर पत्थर मारने या फिर कोड़े मारने की सजा
देश के अलग-अलग प्रांतों में हाल ही में महिलाओं के घर से भाग जाने की खबरें बढ़ी हैं। तालिबानी अधिकारियों ने अवैध तरीके से शादी करने पर महिलाओं को पत्थर मारकर मौत के घाट उतारने या फिर सार्वजनिक तौर पर कोड़े मारने की सजा सुनाई है। इस सजा से बचने के लिए कई महिलाएं आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं या तो घर छोड़ने के लिए।
महिलाओं के खिलाफ अत्याचार बढ़े
पिछले साल अगस्त में काबुल पर अधिकार करने वाले तालिबान शासन ने आर्थिक संकट और प्रतिबंधों के कारण महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता को कम कर दिया है, जिसमें महिलाओं को बड़े पैमाने पर कार्यबल से बाहर रखा गया है। नतीजतन, अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों को मानवाधिकार संकट का सामना करना पड़ रहा है। भेदभाव, शिक्षा, काम, सार्वजनिक भागीदारी और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। खामा प्रेस के अनुसार, कक्षा छह से ऊपर की छात्राओं के स्कूल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
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मीडिया में काम करने वाली 80 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी नौकरी खो दी
तालिबानी फरमान के डर से मीडिया में काम करने वाली लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी नौकरी खो दी है, और देश में लगभग 1.8 करोड़ महिलाएं स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। कई महिलाओं, विशेष रूप से सुरक्षा एजेंसियों में काम करने वाली महिलाओं ने तालिबान के फिर से स्थापित होने के बाद अपनी नौकरी खो दी। अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) ने अगस्त में एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें तालिबान के अधिग्रहण के बाद से अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति की रूपरेखा तैयार की गई थी।