ब्रिटेन की प्लेमाउथ यूनिवर्सिटी ने हाल ही में किए गए अपने अध्ययन से खुलासा किया है कि रोबोट जैसी मशीनें बच्चों की सोच और फैसलों को आसानी से प्रभावित कर सकती हैं। जिसका कारण है व्यस्कों की तुलना में बच्चों का अधिक संवेदनशील होना। बच्चे दबाव में भी आसानी से आ जाते हैं। इस शोध के दौरान शोधकर्ताओं ने बच्चों और व्यस्कों को रोबोट और उनके साथियों की उपस्थिति में समान टास्क दिए थे।
इसमें देखा गया कि जो व्यस्क थे वो अपने साथियों से प्रभावित हुए जबकि बच्चे रोबोट्स से। इसमें 7-9 साल के बच्चे शामिल थे। इस अध्ययन से यह पता चला कि तकनीक के विकास के लिए रोबोट्स काफी सहायक हो सकते हैं लेकिन दूसरी तरफ इससे चिंता भी जाहिर हुई। यह बच्चों और कमजोर लोगों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। यह स्टडी जनरल साइंस एंड रोबोटिक्स में प्रकाशित की गई थी।
शोध करने वालों ने ये भी बताया कि जल्द ही ऑटोनोमस रोबोट का इस्तेमाल एजुकेशन प्रोफेशनल और चाइल्ड थेरेपिस्ट की तरह होगा। इनमें रोबोट खुद से बात करने वालों की सोच को प्रभावित कर पाएंगे। इसके लिए एक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाने की जरूरत पर बल दिया जा रहा है। ताकि बच्चों और रोबोट के बीच बातचीत का कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। इस शोध के लिए चार लाइनें दिखाई गई थीं। फिर पूछा गया कि कौन सी दो लाइनों की लंबाई बराबर है।
इसमें पता चला कि लोग अकेले में कम गलतियां करते हैं जबकि किसी अन्य की मौजूदगी में अधिक। जब बच्चों से अकेले में सवाल पूछे गए तो उनका टेस्ट स्कोर 87 फीसदी रहा और रोबोट्स की मौजूदगी में उनका टेस्ट स्कोर 75 फीसदी रहा। उन्होंने 74 फीसदी उत्तर गलत दिए थे जो कि रोबोट्स के जवाबों से मेल खाते थे।