क्या रूस के आगे अमेरिका लाचार हो गया है? ये चर्चा अब अमेरिकी मीडिया में भी शुरू हो गई है। इनमें विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि यूक्रेन के मुद्दे पर तमाम सख्त रुख दिखाने के बावजूद जो बाइडन प्रशासन कोई प्रभावी कदम उठाने में सक्षम नहीं दिख रहा है। इन विश्लेषणों के मुताबिक रूस और चीन ने मिल कर अमेरिकी वर्चस्व को रोकने में काफी हद तक कामयाबी पा ली है।
लंदन स्थित एसओएएस यूनिवर्सिटी में स्थित चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग ने अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘ये दोनों देश डोनाल्ड ट्रंप के बाद का दौर देख रहे हैं, जब अमेरिका को अफरातफरी में अफगानिस्तान से लौटना पड़ा। उनकी राय है कि अमेरिका रूस को नहीं रोक पाया है। वह कोविड-19 महामारी को भी नहीं संभाल पाया है। इसके बीच उनका यह कहना गलत नहीं है कि अब पूरब का उदय हो रहा है, जबकि पश्चिम ढलान पर है।’
विशेषज्ञों के मुताबिक कई विश्व मंचों से अमेरिका के हट जाने से रूस और चीन का हौसला बढ़ा है। अमेरिकी लोकतंत्र को लेकर गहरा रहे सवालों से भी उनका मनोबल बढ़ा है। चीन और रूस का आकलन है कि इन परिस्थितियों के कारण अब दुनिया में एक खालीपन पैदा हो गया है, जिसे वे भर सकने की स्थिति में हैं। बीत चार फरवरी को अपनी बातचीत के बाद बीजिंग में पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जो साझा बयान जारी किया, उसमें इसी सोच की झलक मिली।
एनबीसी के विश्लेषक एलेक्जेंडर स्मिथ ने लिखा है कि चीन और रूस की गहरा रही निकटता दोनों देशों के फायदे में है। इसका नतीजा यह होगा कि चीन शिनजियांग प्रांत में उइघुर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के कथित दमन, हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों पर कार्रवाई, और ताइवान के मामले में अपने दावे को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का मुकाबला करने की बेहतर स्थिति में होगा। उधर रूस नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के विस्तार को रोकने की अपनी मंशा पूरी कर पाएगा।
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स में चीन के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ किंग्सले एडनी के मुताबिक चीन में दशकों से अमेरिका के ढलान पर होने की चर्चा होती रही है। अब साझा बयान में इस बात को इतने साफ ढंग से कहने का मतलब है कि चीन में ये चर्चा एक ठोस निष्कर्ष पर पहुंच गई है।