अप्रैल 1989, 10 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी आजादी की मांग को लेकर चीन की राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर इकट्ठा हुए थे। सरकार के विरोध में गूंज रही लोकतंत्र की मांग की आवाज धीरे-धीरे शहरों और विश्वविद्यालयों तक पहुंच गई। प्रदर्शनकारी कथित तानाशाही को समाप्त करने और स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मांग कर रहे थे।
एक ऐसा फैसला जिससे हजारों लोगों का खून बहा
थियानमेन चौक पर आजादी के लिए नारा बुलंद कर रहे छात्रों और मजदूरों ने वहां प्रदर्शन जारी रख अप्रैल और मई दो माह गुजार दिए। उनका यह विरोध प्रदर्शन वामपंथी शासन के गले की फांस बनने लगा। जब सत्ता को छात्रों और मजदूरों की आवाजों से अपनी चूलें हिलने का डर लगने लगा तो उसने एक ऐसा फैसला किया, जिसने हजारों लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया। तीन जून की रात को वामपंथी शासन ने इस विरोध प्रदर्शन को कुचल दिया। चीन के वामपंथी शासन के इतिहास में इसे सबसे बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन कहा जाता है जो छह सप्ताह तक चला था।
बढ़ती महंगाई, कम तनख्वाहों और घरों को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर तीन जून की रात टैंकों के साथ थियानमेन चौक पहुंचे सुरक्षाबलों ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिनमें कई निहत्थे लोग मारे गए और घायल हुए। चीन की सरकार ने 2019 में अपने उस कदम का बचाव किया था। चीनी सरकार ने संभवतः पहली बार किसी सार्वजनिक मौके पर इस घटना पर अपनी राय जाहिर की थी। इस घटना के तीस साल पूरे होने पर चीन के रक्षामंत्री वी फेंघी ने एक क्षेत्रीय फोरम में कहा कि उस समय बढ़ती 'अशांति' को रोकने के लिए यह नीति अपनाना ही सही फैसला था।
एक अप्रैल को शुरू हुए इस प्रदर्शन का अंत 3-4 जून को बीजिंग नरसंहार के साथ समाप्त हुआ था। कहा जाता है कि सुरक्षाबल निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे, लेकिन हजारों लोग सड़क पर जमे रहे और वो पीछे हटने को राजी नहीं हुए। इस घटना के बाद चीनी प्रशासन ने कहा था कि कोई भी मारा नहीं गया। हालांकि मारे गए लोगों की संख्या हजारों में बताई जाती है। ब्रिटिश पुरालेख के मुताबिक 1989 में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम 10,000 आम लोग मारे गए थे
जून, 1989 के अंत में चीन की सरकार ने कहा था कि क्रांति विरोधी दंगों के दमन में 200 असैन्य मारे गए और दर्जनों पुलिस एवं सैन्यकर्मी घायल हुए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 200 लोग मारे गए और लगभग सात हजार घायल हुए थे, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार इस नरसंहार में हजारों लोग मारे गए थे। इस घटना की रिपोर्टिंग को भी चीन में बड़े पैमाने पर सेंसर कर दिया था।