केदारघाटी में आई दैवी आपदा के बाद फैली महामारी के कारण घाटी छोड़कर सुरक्षित बाहर निकलने के लिए जहां मारामारी मची है।
वहीं इस घाटी में एक ऐसा गांव भी है जहां के परिवार मानमनौव्वल के बाद भी गांव छोड़कर जाने को तैयार नहीं हैं। इन ग्रामीणों के तर्क इतने संवेदनशील हैं कि सुनने वाला भी भावुक हो जाता है।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
गौरीगांव के इन परिवारों से जब मेरी वार्ता हुई तो इनके सवालों पर मैं भी निरुत्तर हो गया। इनका कहना है कि शासन-प्रशासन को सिर्फ इंसानों की चिंता है, लेकिन क्या जानवरों में प्राण नहीं होते। क्या वे हमारी तरह सांस नहीं लेते, काम नहीं करते। या वे संक्रमण से प्रभावित नहीं होते।
जब वे भी प्रभावित होते हैं तो बुद्धिमानी का दंभ भरने वाले हम लोेग आखिर उनके बारे में क्यों नहीं सोचते। हम गांव छोड़कर नहीं जाएंगे। ये घोड़े खच्चर और अन्य जानवर हमारे साथी हैं। इनके दम पर ही हमारा परिवार पलता है। जब आज मुसीबत आई तो हम इन्हें बेसहारा छोड़कर कैसे जा सकते हैं।
नीचे पहाड़ी पर बसा है गौरीगांव
गौरीगांव जो गौरीकुंड से करीब डेढ़ किलोमीटर ऊपर और जंगलचट्टी से करीब एक किलोमीटर नीचे पहाड़ी पर बसा है। आपदा से पहले इस गांव में 80 परिवार रहते थे। लेकिन आपदा के बाद सिर्फ 11 परिवार ही यहां जमे हुए हैं।
यही वे परिवार हैं जो गांव छोड़कर बाहर जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि ये अपने घोड़े, खच्चर व अन्य जानवरों को अकेले इस गांव में छोड़ने को तैयार नहीं है।
वहीं जानवरों को विस्थापित करने की अभी सरकार की कोई मंशा नहीं है। अगर पूरे हालात पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि यहां जमे इन परिवारों पर न सिर्फ संक्रमण बल्कि मौत के बादल भी मंडरा रहे हैं।
16 जून को केदारघाटी में आई दैवी आपदा के दौरान तीर्थ यात्रियों और स्थानीय लोग जान बचाने के लिए पहाड़ों पर भागे। सोनगंगा में आए उफान से सोनप्रयाग तबाह हो गया। गौरीकुंड में ठहरे लोग जंगल के रास्ते ऊपर सुरक्षित स्थान की ओर भागे।
कई लोग जंगल में ही मर गए
लगातार बारिश होने और ऊपर से पत्थर आने के कारण कई लोग जंगल में ही मर गए। इनकी लाशें गौरीकुंड से जंगलचट्टी के बीच अब भी जगह-जगह पड़ी हैं। ये लाशें अब सड़ने लगी हैं जिससे न सिर्फ दुर्गंध बल्कि संक्रमण भी फैल रहा है।
इसको देखते हुए शासन-प्रशासन आसपास के गांवों को खाली करने की कोशिश कर रहा है। इसी के तहत गौरीगांव को भी खाली कराने की कोशिश की जा रही है।
अब तक 80 परिवारों में से 69 परिवार गांव छोड़कर या तो अपने नाते रिश्तेदारों के घर चले गए हैं या फिर गुप्तकाशी में बनाए गए सरकारी शिविर में। लेकिन शेष 11 परिवार अभी गांव में जमे हैं। हालांकि इन परिवारों की महिलाएं और बच्चे अपने रिश्तेदारों के घर चले गए हैं।
सालभर तक भरण पोषण होता है
इन परिवारों के सदस्य यात्रा के दौरान घोड़े खच्चरों से यात्रियों को केदारनाथ ले जाने का कार्य करते हैं। कुछ डंडी कंडी से यात्रियों को ले जाते हैं। यात्रा सीजन की कमाई से ही पूरे परिवार का सालभर तक भरण पोषण होता है।
गांव में रह रहे जगतराम पंत, मुकेश गोस्वामी, अनूप गोस्वामी, चंद्रा आदि ने बताया कि प्रशासन ने हमलोगों से गांव छोड़ने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने जानवरों के लिए कोई व्यवस्था नहीं दी।
इसलिए हम 11 परिवारों ने तय किया है कि हर परिवार से एक-एक आदमी जानवरों के देखभाल के लिए गांव में ही रहेगा। क्योंकि ये जानवर ही हमारे लिए अन्नदाता हैं, और हम इन्हें बेसहारा छोड़कर नहीं जा सकते।
अभी इन परिवारों को समझाया जा रहा है। उम्मीद है वे हमारी बात मान लेंगे। यदि संक्रमण का प्रकोप ज्यादा बढ़ गया और जरूरत हुई तो जबरन इनसे गांव खाली कराया जाएगा।
- लक्ष्मी चौहान, कार्यवाहक एसडीएम