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वरुणावत पर्वत की वारुणी यात्रा : आस्था, परंपरा और पुण्य का संगम

Wed, 11 Mar 2026 06:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तर काशी
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पंचकोसी वारुणी यात्रा 17 को, जिले ही नहीं बाहर के लोग भी हो होते हैं शामिल
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उत्तरकाशी। वरुणावत पर्वत की वारुणी यात्रा का आयोजन इस बार 17 मार्च को चैत्र मास की त्रयोदशी पर होगी। हर साल पंचकोसी वारुणी यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु वरुणावत पर्वत की परिक्रमा करने के बाद पुण्य अर्जित करते हैं। वारुणी यात्रा में जनपद ही नहीं बल्कि अन्य जनपदों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पंचकोसी वारुणी यात्रा का आयोजन बनारस की काशी के तरह प्राचीन काल से की जाती है। बड़ेथी से शुरू होने वाली यात्रा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु बडेथी में वारुणा और गंगा में स्नान करने के बाद बसुंगा, साल्ड, ज्ञाणजा, शिखरेश्वर होते हुए संग्राली, पाटा, गंगोरी में पहुंचते हैं जो एक दिन में पूरी होती है।
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संग्राली गांव के आचार्य दिवाकर नैथानी और ज्ञाणजा गांव के पंडित शिव प्रसाद भट्ट ने बताया कि यात्रा से मनोकामना की पूर्ति के साथ ही 33 कोटी देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का पुण्य लाभ मिलता है। उन्होंने कहा कि प्राचीनकाल में वरुणा व भागीरथी के संगम पर स्नान के बाद खरवां, कवां, भराणगांव, ऊपरीकोट, मंदणभित्ती, गजोली, संगमचट्टी होते हुए गंगोरी में असी गंगा व भागीरथी के संगम पर स्नान के साथ वृहद पंचकोसी यात्रा संपन्न होती थी। तीन दिन की इस दुर्गम यात्रा में अधिकांशत: साधु संन्यासी ही जाते थे। अब एक दिन में यह यात्रा होती है जिसमें हर आयुवर्ग के लोग शामिल होते हैं।
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