आपदा को ढाई साल बीतने के बाद भी बाढ़ में क्षतिग्रस्त पुलों का पुनर्निर्माण नहीं होने से क्षेत्र की जनता को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
लौंथ्रू गांव जा रही बारात को डिडसारी गांव के लिए लगी ट्राली से नदी पार करने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। अगस्त 2012 एवं जून 2013 की बाढ़ में जिले में करीब एक दर्जन पुल बह गए थे।
इनमें से अभी तक अधिकांश का पुनर्निर्माण नहीं हो पाया है। स्याबा, डिडसारी, अठाली, चामकोट, सेकू आदि गांवों के लिए अभी भी ग्रामीण ट्रालियों के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं।
आम दिनों में तो कोई ज्यादा दिक्कत नहीं होती, लेकिन आजकल शादियों के सीजन में बारात लाने ले जाने में घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।
शुक्रवार को स्यूणा गांव से लौंथ्रू जा रही बारात को डिडसारी गांव के पास लगी ट्राली से भागीरथी नदी पार करने में घंटों इंतजार करना पड़ा। ऐसे में दूल्हे समेत बड़ी संख्या में बारातियों को पैदल ही जंगल के रास्ते लौंथ्रू पहुंचना पड़ा।
मोटर चालित ट्राली में एक बार में चार सवारियों को ही पार ले जाने की व्यवस्था है। भीड़ होने पर ट्राली में क्षमता से अधिक सवारियां ढोने की स्थिति भी बनी। बारिश एवं कड़ाके की ठंड के बीच गांव पहुंचने की जल्दी में आपसी विवाद की स्थिति भी बन रही है।
हालांकि डिडसारी गांव के लिए झूला पुल का निर्माण शुरू हो गया है, लेकिन निर्माण की धीमी प्रगति से ग्रामीणों में रोष है। खिमानंद सेमवाल, सुशील भट्ट, कुलदीप भट्ट, रूपेश प्रसाद व्यास, जेपी भट्ट आदि ने पुल निर्माण की मांग की है।