उत्तरकाशी। सीमांत जनपद की गंगा और यमुना घाटी अपनी पौराणिक परंपरा और संस्कृति के लिए अपनी एक विशेष पहचान रखता है। देव कार्यों से लेकर थोलू-मेला, त्यौहार और शादी व अन्य समारोह में जब तक रासो-तांदी नृत्य न हो। तो वह पूरा नहीं माना जाता है। हालांकि छोंपती-झुमेलो जैसे नृत्य अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। संस्कृति व नाट्य विद्याओं से जुड़े लोगों की माने तो बढ़ते शहरीकरण व पलायन के कारण देव थोलू-मेलों में जगसहभागिता की कमी के कारण इस विद्या को लोग भूल रहे हैं।
उत्तरकाशी जनपद की बात करें तो यहां पर गंगोत्री से यमुनोत्री और मोरी पुरोला के सूदूरवर्ती गांव तक थोलू-मेलों की एक समृद्ध पंरपरा है। इसमें विशेष तौर पर रासो, तांदी, छोंपती-झुमेलो आदि नृत्य प्रमुख है। साथ ही जनपद के विभिन्न गांवों में पांडव नृत्य और हाथी स्वांग आदि भी प्रमुख नृत्य हैं। देवनृत्य होने के कारण इनकी अलग-अलग स्थानों पर अलग शैलियां देखने को मिलती हैं। कहीं पर पांच पांडव पश्वाओं पर अवतरित होकर नृत्य करते हैं। तो कहीं पर इन पश्वाओं के साथ देवी, वीर आदि के पश्वा भी नृत्य करते हुए दिखाई देते हैं। जिले के हर थोलू-मेलों में रासो-तांदी नृत्य अवश्य होता है। लेकिन इन थोलू-मेलों में लगने वाले जनसहभागिता व पहाड़ की विशेष पहचान छोंपती-झुमेलो नृत्य अब विलुप्ति की कगार पर हैं। इस नृत्य में ढोल-दमांऊ का प्रयोग न करके महिला पुरूष रासो-तांदी लगाते हुए स्वयं ही लोकगीतों को गाते थे। इस छोंपती-झुमेलो का आयोजन रात्री से सुबह तक किया जाता था। लेकिन छोंपती नृत्य मात्र दूरस्थ गांवों में ही देखने को मिलते हैं। संवदेना समूह के लेखक, गीत-संगीतकार अजय नौटियाल का कहना है कि हमारी नई पीढ़ी रासो-तांदी के पारंपरिक नृत्य से दूरी बना रहे हैं। ढोल-दमांऊ और रणसिंग की ताल पर लगने वाले रासो-तांदी नृत्य अब ऊंचाई या दूरस्थ क्षेत्र के गांव तक सीमित रह गए हैं। छोंपती की विद्या तो अब देखना बहुत मुश्किल हो गया है।