गंगा भागीरथी और इसकी सहायक नदियों में रेत, बजरी, पत्थर के ढेर लगे हैं, लेकिन इको सेंसिटिव जोन में होने के कारण खनन की अनुमति नहीं मिल पा रही है। ऐसे में सड़क निर्माण एजेंसियां निर्माण सामग्री हरिद्वार आदि स्थानों से मंगा रही है।
चीन सीमा पर आईटीबीपी और सेना की अग्रिम चौकियों को जोड़ने के लिए सुमला से थागला-1, मंडी से टीसांचुकला तथा नीला पानी से मुनिंगला पास की ओर 47.5 किमी लंबी सड़कें निर्माणाधीन हैं। इन सड़कों के निर्माण के लिए रेत, बजरी, रोड़ी-पत्थर की जरूरत है।
गंगा भागीरथी एवं इसकी सहायक नदियां बाढ़ में बहकर आए रेत, पत्थर, बजरी से पटी है। तटवर्ती आबादी के लिए खतरा बने इस मलबे को हटाना भी जरूरी है, लेकिन इको सेंसिटिव जोन की बंदिश के चलते निर्माण एजेंसियों को यहां उपखनिज उठाने की अनुमति नहीं मिल रही है।
विद्युत उत्पादन भी हो रहा प्रभावित
गंगा भागीरथी में जमा मलबा जल विद्युत निगम की 90 मेगावाट की मनेरी भाली प्रथम तथा 304 मेगावाट की स्टेज टू परियोजना पर भी भारी पड़ रहा है। इन दोनों परियोजनाओं के बैराज जलाशय मलबे से अटे हैं, जिससे भागीरथी में कम पानी वाले सीजन में तिलोथ एवं धरासू विद्युत गृह में विद्युत उत्पादन के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है।
हमें भैरोंघाटी से नागा-नीला पानी तक सड़क के डामरीकरण के लिए रोड़ी बजरी नहीं मिल पा रही है। अग्रिम चौकियों की ओर कई और सड़कों के लिए भी हरिद्वार से रोड़ी मंगानी पड़ी। अभी सीमा की ओर 47.5 किमी सड़कें और बननी हैं।
सोमेंद्र बनर्जी, कमान अधिकारी बीआरओ।
कुछ समय के लिए त्रिपाणी के पास केंद्रीय लोनिवि को स्टोन क्रशर की अनुमति दी गई है। नदियों में मलबा उठाने की अनुमति की फाइल उच्चाधिकारियों को भेजी हैं। नदियों में जमा बाढ़ का मलबा यदि सड़क निर्माण के काम आए, तो इससे किसी तरह का पर्यावरणीय नुकसान नहीं होगा और तटवर्ती क्षेत्र में कटाव की समस्या भी रुकेगी।
प्रताप पंवार, रेंज अधिकारी गंगोत्री नेशनल पार्क उत्तरकाशी।