28 साल बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था
मामूली उपचार के लिए लोगों को जाना पड़ता है मीलों दूर
पुरोला। सीमांत गांव लिवाड़ी का एलोपैथिक स्वास्थ्य केंद्र 28 वर्ष बाद भी डॉक्टर, फार्मासिस्ट और पर्याप्त दवाओं के अभाव से जूझ रहा है। हालत यह है कि सामान्य बुखार, जुकाम की दवा भी यहां उपलब्ध नहीं हैं जबकि गंभीर मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को उपचार के लिए 62 किलोमीटर दूर मोरी या 98 किलोमीटर दूर पुरोला जाना पड़ता है।
वर्ष 1993 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के दौरान पर्वतीय विकास मंत्री स्व. बरफिया लाल जुवांठा की पहल पर लिवाड़ी में एलोपैथिक स्वास्थ्य केंद्र स्वीकृत हुआ था और 1998 में इसकी स्थापना हुई। उस समय सड़क नहीं होने से मरीजों को 18 किलोमीटर तक डंडी-कंडी के सहारे जखोल मोटर मार्ग तक पहुंचाना पड़ता था।
सड़क बनने के बाद बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद जगी लेकिन अस्पताल आज भी निजी भवन के छोटे कमरों में संचालित हो रहा है। ग्रामीण मनोज रावत और गुरुदेव रावत का कहना है कि अस्पताल में प्राथमिक उपचार तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। सीमांत क्षेत्र के लोगों को मामूली बीमारी से लेकर प्रसव और गंभीर इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
ग्रामीण कई बार डॉक्टर, फार्मासिस्ट और दवाओं की व्यवस्था की मांग शासन और स्वास्थ्य विभाग से कर चुके हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोरी के प्रभारी डॉ. नितेश रावत ने बताया कि यहां नियुक्त डॉक्टर नौकरी छोड़ चुके हैं। वर्तमान में केंद्र में केवल एएनएम तैनात है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य केंद्र के लिए भूमि उपलब्ध है और स्थायी भवन निर्माण का प्रस्ताव दो वर्ष पूर्व शासन को भेजा जा चुका है।