उत्तरकाशी।
मोरी विकासखंड के दूरस्थ गंगाड़ गांव में आगामी सावन-भादों माह के लिए चौदह भेड़-बकरी पालकों के बीच फुगोल परंपरा के माध्यम से जंगलों का बंटवारा किया गया। इसके बाद अब भेड़-बकरी पालकों की टोलियां अपने-अपने वितरित जंगलों के लिए रवाना हो गई हैं। ग्रामीण इन चौदह जंगलों में से मोरी के अन्य गांव के ग्रामीणों को भी जिम्मेदारियों के साथ चारागाह के रूप में वितरित करते हैं। यह परंपरा इस क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही है।
मोरी विकासखंड के हरकीदून, केदारकांठा, जखोल, पर्वत आदि क्षेत्रों में इन दिनों फुगोल परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। इस परंपरा के तहत ग्रामीण आपसी सहमति और लकड़ी पर लॉटरी के माध्यम से जंगलों का बंटवारा करते हैं। यह परंपरा प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और भाईचारे को दर्शाता है। गंगाड़ गांव के प्रधान सैन सिंह ने बताया कि उनके गांव में इस परंपरा के तहत इस वर्ष चौदह जंगलों का बंटवारा किया गया। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि एक टोली से करीब आठ परिवार जुड़े होने चाहिए। इससे उन परिवारों को भी रोजगार मिल जाता है, जिनके पास अपनी भेड़-बकरियां नहीं होती है। वह लोग उस टोली के साथ मिलकर भेड़-बकरियों को बुग्यालों में लेकर पहुंचते हैं।
उन्होंने बताया कि इसके साथ ही मोरी विकासखंड के कई गांव ऐसे हैं, जिनके पास अपने बुग्याल और जंगल नहीं है। इसलिए उन गांव से लोग पीढ़ी दर पीढ़ी भेड़-बकरियों के चारागाह के लिए गंगाड़ पहुंचते हैं, इसलिए ग्रामीण आपस में बंटे जंगलों को वितरित करते हैं। सैन सिंह ने बताया कि इस परंपरा के बाद अपने ईष्ट देवी-देवताओं की पूजा के साथ भेड़-बकरी पालकों की टोलियों को विदा किया जाता है। साथ ही शीतकाल में इनके सकुशल लौटने पर भी पूजा अर्चना के साथ गांव में विशेष आयोजन किए जाते हैं।